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*दादू दिन दिन राता राम सौं,*
*दिन दिन अधिक स्नेह ।*
*दिन दिन पीवै रामरस, दिन दिन दर्पण देह ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४९. रघुनाथदास जी का उत्कट वैराग्य*
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य: प्रव्रज्य गृहात् पूर्वं त्रिवर्णवपनात् पुन:।
यदि सेवेत तान् भिक्षु: स वै वान्ताश्यपत्रप:॥
आत्मानं चेद् विजानीयात् परं ज्ञानधुताशय:।
किमिच्छन् कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पट:॥[१]
([१] जो त्रिवर्ग के क्षेत्र रूप गृह से प्रथम विरक्त होकर पुन: उन त्रिवर्गों का ही सेवन करता है वह निर्लज्ज मानो वमन किये हुए अन्न को फिर से खाता है।
यदि ज्ञान द्वारा कामनाओं को नष्ट करके अपने को परब्रह्मरूप जान लिया तो लम्पट पुरुष फिर किस कारण और किस इच्छा से इन नाशवान देह को माल खिला-खिलाकर मोटा बनाता है। श्रीमद्भा. ७/१५/३४/४०)
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वैराग्य ही ही भूषण जिनका ऐसे श्री रघुनाथदास जी पुरी में आकर प्रभु के चरणों के समीप रहने लगे। पाँच दिनों तक तो वे गोविन्द से महाप्रसाद लेकर पाते रहे। पीछे उन्होंने सोचा- 'महाप्रसाद को इस प्रकार रोज यहीं से खाना ठीक नहीं है।
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यहाँ प्रभु के समीप और भी तो विरक्त वैष्णव हैं, वे सभी अपनी-अपनी भिक्षा लाते हैं, मुझे भी अपनी भिक्षा स्वयं लानी चाहिये। विरागी होकर यदि भिक्षा मांगने में संकोच हुआ, तो मेरे ऐसे वैराग्य को धिक्कार है।' यह सोचकर उन्होंने प्रभु के यहाँ से महाप्रसाद लेना बंद कर दिया।
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रात्रि में जगन्नाथ जी की पुष्पांजलि के अनन्तर भगवान को शयन कराकर सेवक गण अपने-अपने घरों को चले जाते हैं। उस समय सिंहद्वार पर बहुत-से अन्नार्थी दरिद्र भिक्षुक अपना पल्ला फैलाये खड़े रहते है। सेवक मन्दिर से निकलकर कुछ थोड़ा-बहुत बचा हुआ प्रसाद उन्हें बाँट देते हैं। बहुत-से यात्री भी प्रसाद मोल मांगकर थोड़ा-थोड़ा उन भिक्षुकों को बंटवा देते हैं, कोई पैसा-धेला दे भी देता है।
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उस समय का वहाँ का दृश्य बड़ा ही करुणा जनक होता है। सभी भिक्षुक चाहते हैं कि सबसे पहले हमें ही प्रसाद मिल जाय, क्योंकि प्रसाद चुक जाने पर जिन्हें नहीं मिलता, उनके लिये बांटने वाले फिर थोड़े ही लाते हैं, इसीलिये बांटने वाले को चारों ओर से घेर लेते हैं। जिसे मिल गया उसे मिल गया, जो रह गया सो रह गया, किन्तु वहाँ थोड़ा-बहुत प्राय: सभी को मिल जाता है।
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रघुनाथदासजी भी उन्हीं भिक्षुकों में अपनी फटी गुदड़ी ओढ़कर खड़े हो जाते थे। बिना मांगे किसी ने सबों के साथ में दे दिया तो ले लिया, किसी दिन चुक गया तो वैसे ही चले आये, ये बांटने वाले पर अन्य भिक्षुकों की भाँति टूटे नहीं पड़ते थे। महाप्रभु ने जब दो-एक दिन रघुनाथदास जी को महाप्रसाद पाते नहीं देखा, तब उन्होंने गोविन्द से पूछा- 'गोविन्द ! रघु प्रसाद नहीं पता? वह खाता कहाँ से है?
गोविन्द ने कहा- 'प्रभो ! वे अब सिंहद्वार पर अन्य भिक्षुकों के साथ खड़े होकर भिक्षा मांगते है।' प्रभु इस बात को सुनकर बड़े ही सन्तुष्ट हुए और हार्दिक प्रसन्नता प्रकट करते हुए गोविन्द से कहने लगे- 'गोविन्द ! सचमुच रघु रत्न है, उसे सच्चा वैराग्य है। वैराग्य होने पर मान, प्रतिष्ठा, इन्द्रियस्वाद और लोकलज्जा की परवा ही नहीं रहती। त्यागी होकर जो परमुखापेक्षी बना रहता है, वह तो कूकर के समान है। त्यागी को अपनी वृत्ति सदा स्वतन्त्र रखनी चाहिये।
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भिक्षा मांगकर खाना ही उसके लिये परम भूषण है और दूसरों के अन्न की इच्छा रखना ही भारी दूषण है। जो त्यागी होकर अपनी जिह्वा को वश में नहीं कर सकता, घर छोड़ने पर जिसे भिक्षा का संकोच है, वह तो इन्द्रियों का गुलाम है। परमार्थ का पथ उससे बहुत दूर है।
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वैरागी को निरन्तर नाम-जप करते रहना चाहिये। समय पर जो भी रूखा-सूखा भिक्षा में प्राप्त हो जाय उसी पर निर्वाह करके केवल कृष्ण-कथा-कीर्तन के निमित्त इस शरीर को धारण किये रहना चाहिये। रघु ने यह बहुत सुन्दर काम किया।' इतने त्याग से रघुनाथ जी को कुछ-कुछ शान्ति का अनुभव होने लगा।
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हजारों आदमी जिनके आश्रय से खाते थे, आज से पंद्रह दिन पूर्व जो हजारों आदमियों के स्वामी बने हुए थे, सेवक जिनके समीप सदा हाथों की अंजलियाँ बांधे खड़े रहते थे, वे ही मजूमदार के प्यारे पुत्र रघु एक मुट्ठी सिद्ध अन्न के लिये घंटों सिंह द्वार पर खड़े हुए बांटने वाले की प्रतीक्षा करते रहते हैं और कभी-कभी तो वैसे-के-वैसे ही चले जाते हैं।
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अपने आसन पर जाकर जल पीकर ही बिना कुछ खाये सो जाते हैं, कभी चावल न मिलने पर कोई दयालु पुरुष पैसे-धेले का चना दिलवा देता है उन्हें ही चबाकर पड़ रहते हैं। बढ़िया-बढ़िया व्यंजनों के थालों को आज से पंद्रह दिन पहले सेवक इस भय से डरते-डरते लाते थे कि कहीं किसी में अधिक नमक तो न पड़ गया हो, कोई पदार्थ अधिक गीला तो न रह गया हो।
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वे ही रघु आज सूखे चनों को जल के साथ गले के नीचे उतारते हैं। वाह रे वैराग्य ! धन्य है तेरी शक्ति को, जो महान विलासी को भी परम तितिक्षावान बना देती है।
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रघुनाथदास जी ने एक दिन विनम्र भाव से स्वरूप गोस्वामी से निवेदन किया- 'प्रभु ने मुझे घर-बार छुड़ाकर किस निमित्त यहाँ बुलाया है, इसे जानने की मेरी बड़ी अभिलाषा है। मुझे क्या करना चाहिये। मैं अपना कर्तव्य जानना चाहता हूं'- रघुनाथ जी बड़े ही संकोची थे, वे प्रभु के सामने कभी भी अपने मुँह से कोई बात नहीं निकालते थे। उनकी ओर कभी आँखें उठाकर देखते नहीं थे, जो कुछ कहलाना होता, उसे या तो स्वरूप गोस्वामी द्वारा कहलाते या गोविन्द के द्वारा। स्वयं वे सम्मुख होकर कोई बात नहीं पूछते थे।
(क्रमशः)

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