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*जिसका तिसको दीजिये, सुकृत पर उपकार ।*
*दादू सेवक सो भला, सिर नहिं लेवे भार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
इस अंग में कृपण संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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जे सूरन व्है सूंठि, सप्त धातु गाड्यों बढै ।
तो सुकृत धरि१ मुंठि, त्यों रज्जब राम हि चढै ॥१॥
यदि सात धातु सूरण कन्द और सूंठ के समान होती तो पृथ्वी१ में गाडने से बढती सो तो है नहीं । अत: अपनी मुट्ठी में लेकर जैसे राम के समर्पण हो वैसे ही सुकृत करो तो उनकी वृद्धि होगी ।
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रज्जब धन घर गाडतों, मन गाड्या महि१ माँहिं ।
जीवित पैठै२ गोर३ में, सो प्राणी निकसे नाँहि ॥२॥
यदि धन को घर में गाड़ दिया है तो मन मन को भी पृथ्वी१ में गाड़ दिया, मन धन के पास ही रहेगा । इस प्रकार जो प्राणी जीवित ही कब्र३ में प्रवेश२ करता है वह नहीं निकल सकता ।
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कमला१ कमल२ सु गाड़तों, सुकृत वास३ न होय ।
सूम४ सखी५ अरु पहुप६ परि, गुप्त प्रकट करि जोय ॥३॥
कमल२ पुष्प को पृथ्वी में गाड़ने से सुगंध३ का लाभ नहीं मिलता, वैसे ही लक्ष्मी१ को पृथ्वी में गाड़ने से सुकृत नहीं होता, देखो, कृपण४ का धन तो गड़े हुये पुष्प६ की सुगंध के समान गुप्त रहता है और दानी५ का प्रकट पुष्प६ के समान सबको लाभप्रद होता है, धन को सुकृत में लगाना चाहिये ।
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मौनणि१ मधि माया रही, गुप चुप किन हु न जाण ।
आतम राम हि सौंपतां, घट घट होय बखाण ॥४॥
तिजूरी१ वा पृथ्वी१ में माया पड़ी रही तब तक गुप्त रीति से ही रही, किसी ने भी न जानी और जब सुकृत के निमित्त आत्माराम को दी तो प्रत्येक शरीरधारी से उसकी प्रशंसा के वचन कहे जाने लगे ।
(क्रमशः)

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