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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २६५/२६८*
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कहि जगजीवन दरद सूं, प्रांण निकसि तहँ जाइ ।
औषध मूली रांमजी, हरि परस्यां सुख पाइ ॥२६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरह की पीड़ा से प्राण जब निकलने को होते हैं तब औषधि या जड़ी सिर्फ राम नाम ही है जिसके स्पर्श से ही सुख मिलता है।
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जब लगि बिरह न ऊपजै, तब लगि दुक्ख अनंत ।
कहि जगजीवन दरद सूं, दरद मिटै लहै कंत ॥२६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब तक विरह नहीं होगा तब तक अनंत दुख भोगने होंगे। जब जीवन में प्रभु विरह की पीड़ा होगी तो संसारिक दुःखों से छुटकारा मिलेगा। और परमात्मा प्रियतम अपना लेंगे।
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कहि जगजीवन सैन३ मंहि, सोई दरद जस जागि ।
दौं ज्यौं दाझै देहड़ी४, प्रगटी बिरहा आगि ॥२६७॥
{३. सैन--संकेत(इशारा)} {४. देहड़ी--देह(शरीर)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब विरह होता है तो जीव ईशारा भी समझ जाता है। विरह अग्नि में देह आग की भांति जलती है।
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पढ्या गुण्या मूरख रह्या, सहंसक्रित५ सब जांण ।
कहि जगजीवन रांम सर, भिदै न बिरही बांण ॥२६८॥
(५. सहंसक्रित--संस्कृत भाषा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव पढ लिख कर भी मूर्खतापूर्ण आचरण करतें हैं, चाहे वह संस्कृत का ही ज्ञाता क्यों न हो। संत कहते हैं कि राम जैसे शर को सहज विरह भी नहीं तोड़ सकता है।
(क्रमशः)

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