शनिवार, 30 मई 2020

*साकार अथवा निराकार*

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*सहज सहेलड़ी हे, तूँ निर्मल नैन निहारि ।* 
*रूप अरूप निर्गुण आगुण में, त्रिभुवन देव मुरारि ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २०६)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
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*वैष्णवधर्म तथा साम्प्रदायिकता* 
(गोसाई से)-“यदि आन्तरिकता हो तो सभी धर्मों से ईश्वर मिल सकते हैं । वैष्णवों को भी मिलेंगे तथा शाक्तों, वेदान्तियों और ब्राह्मों को भी, मुसलमानों और ईसाइयों को भी । हृदय से चाहने पर सब को मिलेंगे । कोई कोई झगड़ा कर बैठते हैं । वे कहते हैं कि हमारे श्रीकृष्ण को भजे बिना कुछ न बनेगा; या हमारी कालीमाता को भजे बिना कुछ न होगा; अथवा हमारे ईसाई धर्म को ग्रहण किए बिना कुछ न होगा ।”
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“ऐसी बुद्धि का नाम हठधर्म है, अर्थात् मेरा ही धर्म ठीक है और बाकी सब का गलत । यह बुद्धि खराब है । ईश्वर के पास हम बहुत रस्तों से पहुँच सकते हैं ।”
“फिर कोई कोई कहते हैं कि ईश्वर साकार हैं, निराकार नहीं । यह कहकर वे झगड़ने लग जाते हैं ! जो वैष्णव हैं वह वेदान्ती से झगड़ता है ।”
“यदि ईश्वर के साक्षात् दर्शन हों, तो सब हाल ठीक ठीक बताया जा सकता है । जिसने दर्शन किये है वह ठीक जानता है कि भगवान् साकार भी हैं और निराकार भी । वे और भी कैसे कैसे हैं, यह कौन बताए ।” 
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“कुछ अन्धे एक हाथी के पास गए थे । एक ने बता दिया, इस चौपाये का नाम हाथी है । तब अन्धों से पूछा गया, हाथी कैसा है? वे हाथी की देह छूने लगे । एक ने कहा, हाथी खम्भे के आकार का है ! उसने हाथी का पैर छुआ था । दूसरे ने कहा, हाथी सूप के तरह है उसके हाथ हाथी के कान पड़े थे । इसी तरह किसी ने पेट पकड़कर कुछ कहा, किसी ने सूँड़ पकड़कर कुछ कहा । ऐसे ही ईश्वर के सम्बन्ध में जिसने जितना देखा है, उसने यही सोचा है कि ईश्वर बस ऐसे ही हैं, और कुछ नहीं ।”
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“एक आदमी शौच के लिए गया था । लौटकर उसने कहा, ‘मैंने पेड़ के नीचे एक सुन्दर लाल गिरगिट देखा ।’ दूसरे ने कहा, ‘तुमसे पहले मैं उस पेड़ के नीचे गया था; परन्तु वह लाल क्यों होने लगा? वह तो हरा है । मैंने अपनी आँखों से देखा है ।’ तीसरे ने कहा, ‘मैं तुम दोनों से पहले गया था, उसको मैंने भी देखा है परन्तु वह न लाल है; न हरा; वह तो नीला है ।’ और दो थे, उनमें से एक ने बताया पीला, और एक ने, खाकी । इस तरह अनेक रंग हो गए । अन्त में सब में झगड़ा होने लगा । हर एक का यही विश्वास था कि उसने जो कुछ देखा है, वही ठीक है । उनकी लड़ाई देख एक ने पूछा, ‘तुम लड़ते क्यों हो?’ जब उसने कुल हाल सुना तब कहा, ‘मैं उसी पेड़ के नीचे रहता हूँ; और उस जानवर को मैं खूब पहचानता हूँ । तुममें से हर एक का कहना सच है । वह कभी हरा, कभी नीला, कभी लाल इस तरह अनेक रंग धारण करता है । और कभी देखता हूँ, कोई रंग नहीं निर्गुण है !’
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*साकार अथवा निराकार*
(गोस्वामी से)- “ईश्वर को सिर्फ साकार कहने से क्या होगा ! वे श्रीकृष्ण की तरह मनुष्यरूप धारण करके आते हैं, यह भी सत्य है; अनेक रूपों से भक्तों को दर्शन देते हैं, यह भी सत्य है; और फिर वे निराकार अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, यह भी सत्य है । वेदों ने उनको साकार भी कहा है, निराकार भी कहा है; सगुण भी कहा है और निर्गुण भी ।”
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“किस तरह, जानते हो । सच्चिदानन्द मानो एक अनन्त समुद्र है । ठण्डक के कारण समुद्र का पानी बर्फ बनकर तैरता है । पानी पर बर्फ के कितने ही आकर के टुकड़े तैरते हैं । वैसे ही भक्तिहिम के लगने से सच्चिदानन्द-सागर में साकार मूर्ति के दर्शन होते हैं । वे भक्त के लिए साकार होते हैं । फिर जब ज्ञानसूर्य का उदय होता है तब बर्फ गल जाती है, फिर वही पहले का पानी ज्यों का त्यों रह जाता है । ऊपर-नीचे जल ही जल भरा हुआ है । इसीलिए श्रीमद्भागवत में सब स्तव करते हैं, हे देव, तुम्हीं साकार हो, तुम्हीं निराकार हो । हमारे सामने तुम मनुष्य बने घूम रहे हो, परन्तु वेदों ने तुम्हीं को वाक्य और मन से परे कहा है ।”
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“परन्तु यह कह सकते हो कि किसी किसी भक्त के लिए वे नित्य साकार हैं । ऐसा भी स्थान है जहाँ बर्फ गलती नहीं, स्फटिक का आकार धारण करती है ।” 
केदार- श्रीमद्भागवत में व्यासदेव* ने तीन दोषों के लिए परमात्मा से क्षमाप्रार्थना की है । एक जगह कहा है, हे भगवन् तुम मन और वाणी से दूर हो, किन्तु मैंने केवल तुम्हारी लीला, तुम्हारे साकार रूप का वर्णन किया; अतएव अपराध क्षमा करो ।
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श्रीरामकृष्ण- हाँ, ईश्वर साकार भी हैं और निराकार भी, फिर साकार-निराकार के भी परे हैं । उनकी इति नहीं की जा सकती ।
*रूप रुपविवर्जितस्य भवतो ध्यानेन यत् कल्पितं 
स्त्युत्यनिर्वाचनीयताऽखिलगुरो दृरोकृता यन्मया ।
व्यापित्वंच निराकृतं भगवतो यतीर्थयात्रादिना,
क्षन्तव्यं जगदीश ! तद्विकलतादोषत्रयं मत्कृतम् ।।
(क्रमशः)

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