शनिवार, 30 मई 2020

साच का अंग ४३/४६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
.
*दिल दरिया में गुसल हमारा, ऊजू कर चित लाऊँ ।*
*साहिब आगे करूं बंदगी, बेर बेर बलि जाऊँ ॥४३॥*
मेरा हृदय ही समुद्र के समान है । इसमें मैं नाम चिन्तन रूपी जल से स्नान कर रहा हूं । मुसलमानों के मत में दोनों हाथ और दोनों पैर और मुख को जल से धोने को उजू कहते हैं । मैं तो पांचों इन्द्रियों को प्रत्याहार जल से स्नान कराकर अपने चित्त में भगवान् का चिन्तन कर रहा हूँ । यह ही मेरे भजन का प्रकार है ।
.
*दादू पंचों संग संभालूं सांई, तन मन तब सुख पाऊँ ।*
*प्रेम पियाला पिवजी देवै, कलमा ये लै लाऊँ ॥४४॥*
मुसलमान कलमा किया करते हैं । दादूजी कहते हैं कि मेरे मत में तो पांचों ज्ञानेन्द्रियों से हरि स्मरण करना ही कलमा है और भगवान् मुझे प्रेम का प्याला पिला रहे हैं । इसीसे मैं बहुत ही सुखी हो रहा हूं । हे साधक ! तुम भी चारों तरफ से अपने मन की वृत्ति को रोक कर भगवान् में लीन करदो ।
.
*शोभा कारण सब करै, रोजा बांग नमाज ।*
*मुवा न एकौ आह सौं, जे तुझ साहिब सेती काज ॥४५॥*
मुसलमानों के मत में ब्रत को रोजा कहते हैं । उच्च स्वर से प्रार्थना को वांग कहते हैं, मस्तक झुकाने को नमाज पढ़ना कहते हैं । यह सब शोभा के लिये ही करते हैं प्रभु को प्रसन्न करने के लिये नहीं होता । यदि यह सब काम प्रेम से किये जांय तो तत्काल विरह पैदा हो जाय और विरह से मृत्यु हो जाय । इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे शोभा के लिये तथा दूसरों को दिखाने के लिये ही है ।
.
*हर रोज हजूरी होइ रहु, काहे करै कलाप ।*
*मुल्ला तहाँ पुकारिये, जहँ अर्श इलाही आप ॥४६॥*
हे साधक ! जब तक जीवन है तब तक हरि का स्मरण करो, यह सिद्धांत उचित है । केवल पांच समय ही भक्ति करना परमेश्वर की प्रसन्नता के लिये पर्याप्त नहीं मानी जाती । किन्तु दिन रात करो और वह भी मौन होकर अपने हृदय में ही करो जहां हृदय में प्रभु विराजते हैं । जहाँ समाधि में अनाहत नाद सुनाई पड़ता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें