शुक्रवार, 22 मई 2020

साच का अंग ८/१२

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*माँस अहारी मद पीवै, विषय विकारी सोइ ।*
*दादू आत्मराम बिन, दया कहाँ थी होइ ॥८॥*
जो मांसाहारी तथा मद्य पीने वाले हैं वे ही विषय विकारों में आसक्त रहते हैं । उनको सत्संग के बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता और आत्मज्ञान के विना उनके हृदय में दया पैदा नहीं हो सकती है । 
पद्मपुराण में- जो प्राणियों की हत्या करने वाले हैं, उनको इस लोक तथा परलोक में भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता है तथा जो किसी की भी हत्या नहीं करते वे किसी से भी भयभीत नहीं होते । जैसे टेढी मेढी चलती हुई नदियां समुद्र में मिल जाती हैं । वैसे ही सारे धर्म अहिंसा में समाहित हो जाते हैं ।
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*लंगर लोग लोभ सौं लागैं, बोलैं सदा उन्हों की भीर ।*
*जोर जुल्म बीच बटपारे, आदि अंत उनहीं सौं सीर ॥९॥*
इस संसार में निर्लज्ज तथा बलात्कार करने वाले अत्याचारी भेद बुद्धि वाले निन्दक मनुष्य बहुत हैं । ऐसे पुरुषों का साधक को संग नहीं करना चाहिये ।
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*तन मन मार रहे सांई सौं, तिनकौं देख करैं ताजीर ।*
*ये बड़ि-बूझ कहाँ थैं पाई, ऐसी कजा अवलिया पीर ॥१०॥*
जो संयमी भक्त भगवान् को भजते हैं उनको देख देखकर हिंसक लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं । हे यवनो ! आपको भक्तों के साथ ईर्ष्या करना किस गुरु ने सिखाई है । क्या आपका गुरु ऐसा ही है जो आप लोगों को ईर्ष्या का पाठ पढ़ाता है और फिर भी अपने को गुरु मानता है । क्या आप लोग भी नरक में जाने से नहीं डरते हो । यदि नरक से डरते हो तो दूसरों की निन्दा, ईर्ष्या तथा हत्या करना छोड़ दो ।
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*बे महर गुमराह गाफिल, गोश्त खुरदनी ।*
*बेदिल बदकार आलम, हयात मुरदनी ॥११॥*
जो दया रहित परमार्थ पथ से भ्रष्ट प्रमादी मांसाहारी दुष्ट हृदयवाले नीच कर्म करने वाले मानव हैं वे जीते हुए ही मुर्दे के तुल्य हैं । सत्पुरुषों को ऐसे पुरुषों का संग नहीं करना चाहिये ।
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*॥ साच ॥*
*छल कर बल कर घाइ कर, मारै जिंहि तिंहि फेरि ।*
*दादू ताहि न धीजिये, परणै सगी पतेरि ॥१२॥*
जो छल कर इधर उधर दौड़ते हुए प्राणियों की हिंसा करते हैं तथा चाचा की पुत्री के साथ भी रमण करते हैं । वे विश्वास के योग्य नहीं हैं ।
(क्रमशः)

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