शुक्रवार, 22 मई 2020

*४. विरह कौ अंग ~ २४१/२४४*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २४१/२४४*
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जब लग मांहीं बिरह नहिं, तब लग जुडै न संधि ।
कहि जगजीवन नासिका, लहै पुरुष की गंधि ॥२४१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब तक परमात्मा का विरह न होगा तब तक परमात्मा से कोइ योग नहीं बनेगा। उदाहरण से समझाते हुये कह रहै कि जिस प्रकार नासिका गंध द्वारा पुरुषों को पहचान पाती है उसी प्रकार जीव विरह द्वारा प्रभु को जान पाते हैं।
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आज करूं तन मन विलै, अैसा अंदरि भाव ।
जगजीवन कहै रांमजी, रस भोगी घर आव ॥२४२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मेरे अतंर में ऐसा भाव उठा है कि मैं अपना तन मन परमात्मा में विलय कर दूं। हे राम आप मेरी इस अवस्था पर मुझे स्वीकार करने पधारें।
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हूं हेरूं१ हरि नांम ल्यौ, है तो मांहि आइ । 
तेरा दरसन देख करि, जगजीवन बलि जाइ ॥२४३॥
(१. हेरूं-खोजती हूँ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मैं तो प्रभु नाम को ही ढूंढ रही हूँ। आप मेरे अतंर मन में विराजे मैं आपके दर्शन को पाकर बलिहारी हो जाउंगी।
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बिरहनी का घर जल गया, बिरह अगिनि की आंच ।
जगजीवन तहां ऊबरे, रांम पियारे पांच ॥२४४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विरहनी का भौतिक घर प्रभु विरहाग्नि में भस्म हो गया अब जो पांच ज्ञानेन्द्रिया शेष है वे राम नाम को ही पुकार रहे है।
(क्रमशः)

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