रविवार, 24 मई 2020

*१४९. रघुनाथदास जी का उत्‍कट वैराग्‍य*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जीवित मृतक यही निशानी,*
*दुर्बल देही निर्मल वाणी ।*
*दादू भाव भक्ति दीनता अंग,*
*प्रेम प्रीति सदा तिहिं संग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ जीवित मृतक का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१४९. रघुनाथदास जी का उत्‍कट वैराग्‍य*
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उसी समय पीछे आने वाले गौड़ीय भक्‍त भी पुरी आ गये। और सदा की भाँति चार महीने रहकर देश को लौट गये, गोवर्धनदास जी मजूमदार ने जब भक्‍तों के पुरी से लौटने का समाचार सुना तो उन्‍होंने उसी समय अपना आदमी शिवानन्‍द जी के पास भेजकर रघुनाथदास जी का पता लगवाया।
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सेन महाशय के यहाँ पहुँचकर आदमी ने उन्‍हें प्रणाम करके पूछा- 'मेरे स्‍वामी ने आपसे पूछवाया है कि मेरा लड़का रघुनाथदास यहाँ से पुरी भाग गया है, वह आपको पुरी में तो नहीं मिला?' सेन महाशय ने कहा- 'पुरी में सभी विरक्‍त वैष्‍णवों से अधिक रघुनाथदास तितिक्षु हैं।
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उनका नाम वहाँ सभी जानते हैं। वे सिंहद्वार पर भिक्षा में जो मिल जाता है, उसे ही खाकर अहर्निश श्रीकृष्‍ण- कीर्तन करते रहते हैं। वे सकुशल प्रभु के पादपद्मों के समीप निवास कर रहे हैं।' सेवक ने सभी वृत्तान्‍त सप्‍तग्राम में जाकर अपने स्‍वामी से कह दिया- 'मेरा इकलौता पुत्र एक मुट्ठी चावलों के लिये मन्दिर के द्वार पर खड़ा रहता है।'
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इस समाचार को सुनते ही धन-सम्‍पत्ति को ही सब कुछ समझने वाला पिता शोक से 'हाय हाय 'करने लगा। माता अश्रुओं से पृथ्‍वी को भिगोने लगी। अन्‍त में पिता ने अपने पुत्र के लिये ४०० रुपये देकर एक सेवक और रसोइया शिवानन्‍द जी सेन के पास भेजा।
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सेन महाशय ने कहा- 'अभी जाड़े के दिन हैं, तुम लोग कहाँ जाओगे? चार-पाँच महीने ठहरो, जब हम चलेंगे तभी चलना। 'सेवक इस उत्तर को सुनकर लौट आये और जब सेन महाशय दूसरी बार वर्षा के आरम्भ में चलने लगे, तब रुपये लेकर वे सेवक भी उनके भी साथ चले।
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पुरी में पहुँचकर सेवकों ने रघुनाथदास जी को उनके पिता का सभी समाचार सुनाया और जो द्रव्‍य वे साथ लाये थे, उसे भी उन्‍हें देना चाहा, किन्‍तु उन्‍होंने द्रव्‍य लेना स्‍वीकार नहीं किया। रघुनाथदास जी के अस्‍वीकार करने पर भी सेवक द्रव्‍य लेकर वहीं रहने लगे।
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रघुनाथदास जी ने 'सोचा जब द्रव्‍य आ ही गया है, तो इसके द्वारा प्रभु की सेवा ही क्‍यों न की जाय। 'यही सोचकर वे महीने में दो बार प्रभु का निमन्‍त्रण करते और उन्‍हें भगवान के प्रसादी के सुन्‍दर-सुन्‍दर पदार्थ लाकर भोजन कराते। प्रभु इनकी प्रसन्‍नता के निमित्त इनके निमन्‍त्रण पर जाकर भिक्षा कर आते थे।
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इस प्रकार दो वर्षों तक रघुनाथदास जी प्रभु का निमन्‍त्रण करते रहे। उसमें खर्च ही क्‍या होना था, महीने में लगभग आठ आने खर्च होते थे। एक दिन रघुनाथदास जी ने सोचा- 'जब मैंने घर-बार, कुटुम्‍ब-परिवार सबको छोड़ दिया है और सबसे सम्‍बन्‍ध-विच्‍छेद कर दिया हे, तो फिर मैं पिता के रुपयों से प्रभु का निमन्‍त्रण भी क्‍यों करुँ?
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इस निमन्‍त्रण से प्रभु सन्‍तुष्‍ट थोड़े ही होते होंगे। वे तो मेरी प्रसन्‍नता के निमि‍त्त यहाँ आकर भिक्षा कर जाते हैं।' यह सोचकर उन्‍होंने प्रभु का निमन्‍त्रण करना बंद कर दिया। एक दिन प्रभु ने स्‍वरूप गोस्‍वामी से पूछा- 'स्‍वरूप ! न जाने क्‍या बात है, अब रघु हमारा निमन्‍त्रण नहीं करता। कहीं नाराज तो नहीं हो गया?'
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स्‍वरूप गोस्‍वामी जी ने कहा- 'प्रभो ! रघु ने सोचा होगा, विषयी लोगों के द्रव्‍य से प्रभु का निमन्‍त्रण करने से क्‍या लाभ? इससे प्रभु भी सन्‍तुष्‍ट न होते होंगे और मेरे मन में भी संकल्‍प-विकल्‍प रहता है, यही सोचकर उन्‍होंने निमन्‍त्रण करना छोड़ दिया।'
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प्रभु ने कहा- 'स्‍वरूप? तुम ठीक कहते हो। विषयी लोगों के अन्‍न खाने से रजोगुण के भावों की वृद्धि होती है। विषयी लोगों के अन्‍न में कामनाओं के परमाणु रहते है। संसारी लोग कामना शून्‍य होकर तो अपने जामाता को भी नहीं खिलाते। सकाम परमाणुओं से बुद्धि भी मलिन हो जाती है और मलिन बुद्धि से श्रीकृष्‍ण-कीर्तन हो नहीं सकता।
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अत: जहाँ तक हो, विषयी धनिक पुरुषों के अन्‍न से तो बचना ही चाहिये। मैं तो रघु के प्रेम संकोच से आज तक चला जाता था, उसने बड़ा अच्‍छा किया जो निमन्‍त्रण बंद कर दिया। 'इतना कहकर प्रभु स्‍वरूप गोस्‍वामी से रघुनाथ जी के त्‍याग और वैराग्‍य की बड़ाई करने लगे।
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इधर अब रघुनाथदास जी को सिंहद्वार पर खड़े होकर मांगना कुछ बुरा-सा प्रतीत होने लगा। लोग उनसे परिचित हो गये थे, इसलिये बहुत-से सुन्‍दर-सुन्‍दर पदार्थ देने लगे। प्रभु ने सुन्‍दर स्‍वादिष्‍ट पदार्थों के खाने के लिये निषेध कर दिया था; इसलिये उन्‍होंने सिंहद्वार की भिक्षा भी बंद कर दी।
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अब ये भिक्षुकों के साथ क्षेत्र में जाकर वहाँ से प्रसादी भात ले आते थे।
महाप्रभु सायं काल के समय रोज रघुनाथ जी को सिंहद्वार पर खड़ा हुआ देख जाते थे। जब उन्‍होंने दो-चार दिन रघुनाथदास जी को वहाँ नहीं देखा तब उन्‍होंने एक दिन गोविन्‍द से पूछा- 'गोविन्‍द ! रघु अब सिंहद्वार पर नहीं दीखता, पता नहीं, वह अब कहाँ से भिक्षा करता है?
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गोविन्‍द ने कहा- 'प्रभो! अब उन्‍होंने सिंहद्वार की भिक्षा बंद कर दी है, अब वे क्षेत्र से जाकर दिन में ही मांग ला‍ते हैं।' प्रभु ने सन्‍तुष्टि के स्‍वर में कहा- 'रघु ने यह सर्वोत्तम कार्य किया। सिंहद्वार पर भिक्षा की लालसा से खड़े रहना वेश्‍यावृत्ति है।
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मुँह से भले ही नाम-जप करते रहो, चित्त में सदा यही बनी रहती है कि कोई अब देने वाला आ जाय। यह आयेगा तो जरूर कुछ-न-कुछ देगा। अच्‍छा इसने नहीं दिया तो यह तो जरूर ही कुछ देगा। बस, ये ही भाव उठते रहते हैं। क्षेत्र में अच्‍छा है अपना एक बार जाकर ले आयें और श्री कृष्‍ण-कीर्तन करते रहें।'
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इतने में ही स्‍वरूप गोस्‍वामी आ गये। उन्‍हें देखते ही प्रभु उल्‍लास के स्‍वर में कहने लगे- 'हाँ, हाँ तुम खूब आ गये, कैसे ठीक समय पर पहुँचे। अभी-अभी तुम्‍हारे रघु का ही प्रसंग चल रहा था। उसने सिंहद्वार की भिक्षा क्‍यों बंद कर दी है?' स्‍वरूप गोस्‍वामी धीरे से कहा- 'वह विचित्र है, जहाँ उसे कुछ भी वैराग्‍य में कमी दीखती है, वहीं उस काम को बंद कर देता है। उसने सिंहद्वार की भिक्षा में कुछ दोष देखा होगा।'
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प्रभु ने कहा- 'उसकी इस बात से हम बहुत ही अधिक सन्‍तुष्‍ट हैं, उसे बुलाओ तो सही, कहाँ है? गोविन्‍द उसी समय जाकर रघुनाथदास जी को बुला लाये। प्रभु को और स्‍वरूप गोस्‍वामी को प्रणाम करके धीरे-धीरे भगवन्‍नामों का उच्‍चारण करते हुए रघुस्‍वरूप के एक ओर बैठ गये। प्रभु जल्‍दी से उठे और भीतर से कुछ चीज उठाकर ले आये।
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प्रभु आकर रघुनाथ जी के ही समीप बैठ गये। रघुनाथदास जी संकोच के कारण और अधिक सिकुड़ गये। प्रभु उनके सुन्‍दर बालों पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए कहने लगे- 'रघु ! मैं तुम पर बहुत ही अधिक सन्‍तुष्‍ट हूँ। मैं प्रसन्‍न होकर तुम्‍हें कुछ देना चाहता हूँ, किन्‍तु मुझ निष्किंचन के पास देने को और है ही क्‍या? जो मेरी सबसे प्‍यारी सम्‍पत्ति है, उसे ही तुम्‍हें देकर मैं सन्‍तुष्‍ट हूंगा।
(क्रमशः)

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