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*खोटा खरा परखिये, दादू कस-कस लेइ ।*
*साचा है सो राखिये, झूठा रहण न देइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*परम साँच का अंग ११९*
इस अंग में परम साँच संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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माया रूपी साँच बहु, आतम ठग हिं अनेक ।
रज्जब सो न ठगाव ही, जिनके परम विवेक ॥१॥
माया रूपी अर्थात दंभ पूर्ण सत्य तो बहुत हैं, जिसमें अनेक जीवात्माओं को ठगा जाता है किन्तु उसमें वे नहीं ठगाते जिनके हृदय में परम सत्य का विवेक उदय हो गया है ।
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एक साँच अंजन१ मयी, नहीं निरंजन मेल ।
रज्जब रले२ सु झूठ में, ताथै संत हु ठेल३ ॥२॥
एक सत्य तो माया१ रूप है, उसमें परम सत्य निरंजन ब्रह्म का मेल नहीं है वा उसमें निरंजन नहीं मिलते । मिथ्या माया में मिले२ हुये होने से ऐसे सत्य को संत त्याग३ देते हैं ।
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साँच साँच मधि छांण तों, तत१ वित२ कर चढ जाय ।
रे रज्जब जन जौहरी, कहु क्यों खोटा खाय ॥३॥
माया रूप सत्य को परम सत्य रूप चलणी से छाणने पर अर्थात विचारने पर परम तत्त्व१ रूप धन२ हाथ लग जाता है, जैसे परीक्षक जौहरी खोटा धन नहीं लेता, वैसे ही कहो संत जन माया रूप मिथ्या सत्य से धोखा कैसे खायेंगे ?
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रज्जब साँच स्वरूप झूठ ह्वै, पैठ१ हि प्राण हुं मांहिं ।
आख्यूं२ अनत३ सु निकसे, नहीं तो निकसे नांहि ॥४॥
झूठ सत्य का स्वरूप धारण करके प्राणी में प्रवेश१ करती है, वह कहने२ से ही निकलकर अन्यत्र३ जाती है वा सदगुरु के कहने से पहचानने पर ही वह निकलकर अन्यत्र३ जाती है, सदगुरु उपदेश नहीं प्राप्त हो तो नहीं निकलती ।
(क्रमशः)

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