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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ २७७/२८०*
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कोटि कुरान कतेब सब, अलफ इलम किंहिं कांम ।
कहि जगजीवन बन्दगी, अलह लहै तन तांम ॥२७७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यदि हम में सेवा का भाव न हो तो करोड़ों वेद कुरान पुस्तक में जो वर्णित है, वह हमारे किसी काम का नहीं है, संत कहते हैं कि प्रभु तो सेवा भाव में ही रहते हैं।
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मुल्ला दिल में बांग दे, निरखि निवाज गुजार ।
कहि जगजीवन बंदगी, अलह लहै तन तार ॥२७८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे मौलवी परमात्मा को मन में ही पुकार, उस अल्लाह को मन में देख कर ही नमाज अदा कर। संत कहते हैं कि अल्लाह तो सेवा से ही सुध लेते हैं।
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चतुराइ आलम इलम, इन मंह म्यहरि१ होइ ।
कहि जगजीवन अलह लहै, इस्क कहावै सोइ ॥२७९॥
(१. म्यहरि-महर=दया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव का सारा चातुर्य व ज्ञान का सार यह ही है कि, सब के प्रति दया भाव हो दयालु प्रभु वह ही पसंद करते हैं, वह ही सच्चा प्रेम है।
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बंदा सोइ खुदाइ का, दरदवंद दिल पाक ।
कहि जगजीवन मूम दिल२ को, कम दिल दहै न पाक ॥२८०॥
(२. मूंमदिल=मोमदिल-कोमलहृदय)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दो ही बंदे परमात्मा को प्रिय हैं एक जिनके मन में परमात्मा से मिलने की पीड़ा है, और जो दिल के साफ हैं, जिनका मन मोम जैसा नमनीय है प्रभु उन्हें ताप नहीं देते अपनी दया में रखते हैं।
(क्रमशः)

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