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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*हरदम हाजिर होना बाबा, जब लग जीवै बंदा ।*
*दायम दिल सांई सौं साबित, पंच वक्त क्या धंधा ॥४७॥*
*॥ हिंदू मुसलमानों का भ्रम ॥*
*दादू हिंदू मारग कहैं हमारा, तुरक कहैं रह मेरी ।*
*कहाँ पंथ है कहो अलह का ? तुम तो ऐसी हेरी ॥४८॥*
हिन्दू कहते हैं कि हमारा मार्ग अच्छा है, मुसलमान कहते हैं कि हमारा मार्ग ठीक है । परन्तु अभी तक भी इनका विवाद समाप्त नहीं हुआ और विवाद ग्रस्त मार्ग से चलने पर कभी प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती है । अतः शास्त्र-सिद्ध जो मार्ग है विवाद को छोड़कर उसमें ही चलना चाहिये ।
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*दादू दुई दरोग लोग को भावै, सांई को साँच पियारा ।*
*कौन पंथ हम चलैं कहो धू, साधो करो विचारा ॥४९॥*
संसारी पुरुष प्रायः द्वैत व्यवहार प्रधान ही होते हैं और असत्य ही उनको प्रिय होता है । अतः असत्य व्यवहार को ही सत्य मानकर उसी पर चलते हैं । भगवान् को तो सदा सत्य प्रिय है क्योंकि वे स्वयं सत्यस्वरूप हैं इसलिये हे साधक तू अपनी बुद्धि से विचार कर जो सत्य मार्ग है उसी से चल ।
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*खंड खंड कर ब्रह्म को, पख पख लीया बाँट ।*
*दादू पूरण ब्रह्म तज, बँधे भरम की गाँठ ॥५०॥*
अविद्या से आच्छादित मूर्ख मनुष्य ईश्वर की सर्वात्मकता का विचार किये बिना ही अपने अपने भावों के अनुसार ईश्वर को भी नाना मानते हैं, और परस्पर में विवाद करते रहते हैं । विचार करने से तो ब्रह्मादि देवताओं के स्वरूप में अथवा उनी प्रतिमा आदि में भी अन्तर्यामी ब्रह्म एक ही है और वह ही सब में रहता हुआ उपासकों को फल देता है । फिर भी भ्रान्त पुरुषों को प्रयत्न पूर्वक उनको ज्ञान देने पर भी अविद्या मूलक अपने भ्रम को नहीं त्यागते । अतः साधक को चाहिये कि अन्तर्यामी ब्रह्म एक ही है ।
यदि सर्वत्र ईश्वर एक ही है तो शास्त्र में तन्मूर्ति के भेद की कल्पना करके भिन्न भिन्न उपासना का विधान क्यों किया है । इस का समाधान यह है कि बहिर्मुख प्राणियों को धीरे धीरे अन्तर्मुख करके परमात्मा ही जीवात्मा है ऐसा ज्ञान उनको देकर मुक्त करने के लिये अनादिकाल से जो भेद चल रहा है उसको उनकी बुद्धि के अनुसार मान कर भेद बुद्धि से शास्त्रों में उपासना बतलाई है । उपासना का भेद में तात्पर्य नहीं है । किन्तु एकत्व बोधन में तात्पर्य जानना ।
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*॥ मन विकार औषधि ॥*
*जीवत दीसै रोगिया, कहैं मूवां पीछै जाइ ।*
*दादू दुँह के पाढ में, ऐसी दारू लाइ ॥५१॥*
सांसारिक पुरुष अविद्या ग्रस्त होने के कारण अविद्या मूलक कर्मों से ही मुक्ति की इच्छा करते हैं लेकिन अज्ञानमूलक करोड़ों कर्मों से भी वासना जाल नष्ट नहीं हो सकता । किन्तु ज्ञान से ही निवृत्त हो सकता है । इसलिये सभी राम नाम रूपी औषधि का सेवन करे । जिससे मूल सहित वासना नष्ट हो जाय ।
विवेक चूड़ामणि में- वासना का जाल न तो अस्त्र शस्त्रों से न वायु आग से न करोड़ों कर्मों से नष्ट हो सकेगा किन्तु ईश्वर की कृपा तथा विवक विज्ञान रूपी तलवार से ही नष्ट होगा ।
(क्रमशः)

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