मंगलवार, 5 मई 2020

*११८. श्री जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*हरि रस माते मगन भये ।*
*सुमिर सुमिर भये मतवाले,*
*जामण मरण सब भूल गये ॥*
*निर्मल भक्ति प्रेम रस पीवैं,*
*आन न दूजा भाव धरैं ।*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २७२)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११८. श्री जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा*
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स जीयात कृष्‍णचैतन्‍य: श्रीरथाग्रे ननर्त य:।
येनासीज्‍जगतां चित्रं जगन्‍नाथोऽपि विस्मित:॥[१]
([१] जिन्‍होंने रथ के आगे ऐसा नृत्‍य किया जिससे समस्‍त जगत तथा साक्षात जगन्‍नाथ जी भी विस्मित हो गये, उन श्रीकृष्‍ण चैतन्‍य भगवान की जय हो। चैत. चरि. म. ली. १३/१)
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गुण्टिचा(उद्यान मन्दिर) के मार्जन के दूसरे दिन नेत्रोत्‍सव था। महाप्रभु अपने सभी भक्‍तों को साथ लेकर जगन्‍नाथ जी के दर्शन के लिये गये। पंद्रह दिनों के अनवसर के अनन्‍तर आज भगवान के दर्शन हुए हैं, इससे महाप्रभु को बड़ा ही हर्ष हुआ। वे एकटक लगाये श्रीजगन्‍नाथ जी के मुखारविन्‍द की ओर निहार रहे थे। उनकी दोनों आखों में से अश्रुओं की दो धाराएँ बह रही थीं।
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उनके दोनों अरुण ओष्‍ठ नवपल्‍लवों की भाँति हिल रहे थे और वे धीरे-धीरे जगन्नाथ जी से कुछ कह रहे थे, मानो इतने दिन के वियोग के लिए प्रेमपूर्वक उलाहना दे रहे हों। दोपहर तक महाप्रभु अनिमेष भाव से भगवान के दर्शन करते रहे। फिर भक्‍तों के सहित आप अपने स्‍थान पर आये और महाप्रसाद पाकर फिर कथा-कीर्तन में लग गये।
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दूसरे दिन जगन्‍नाथ जी की रथ यात्रा का दिवस था। प्रभु के आनन्‍द की सीमा नहीं थी। वे प्रात:काल होने के लिये बड़े ही आकुल बने हुए थे। मारे हर्ष के उन्‍हें रात्रिभर नींद ही नहीं आयी।
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रात भर वे प्रेम में बेसुध हुए जागरण ही करते रहे। दो घड़ी रात्रि रहते ही आप उठकर बैठ गये और सभी भक्‍तों को भी जगा दिया। शौच स्‍नानादि से निवृत्त होकर सबके साथ महाप्रभु ‘पाण्‍डुविजय’ के दर्शन के लिये चले।
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ज्‍येष्‍ठ की पूर्णिमा से लेकर आषाढ़ की अमावस्‍या तक भगवान महालक्ष्‍मी के साथ एकान्‍त में वास करते हैं। प्रतिपदा के दिन नेत्रोत्‍सव होता है तभी जगन्‍नाथ जी के दर्शन होते हैं। द्वि‍तीया या तृतीया को रथ पर चढ़कर भगवान श्रीराधिका जी के साथ एक सप्‍ताह से अधिक निवास करने के लिये सुन्‍दराचल को प्रस्‍थान करते हैं।
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वही रथ यात्रा कहलाती है! जिस समय रथ जाता है उसे ‘रथ यात्रा’ कहते हैं और विश्राम के पश्‍चात जब रथ लौटकर मन्दिर की ओर आता है उसे ‘उलटी रथ-यात्रा’ कहते हैं। रथ-यात्रा के समय तीन रथ होते हैं।
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सबसे आगे जगन्‍नाथ जी का रथ होता है, उनके पीछे बलराम जी तथा सुभद्रा जी के रथ होते हैं। भगवान का रथ बहुत विशाल होता है, मानो छोटा-मोटा पर्वत ही हो। सम्‍पूर्ण रथ सुवर्णमण्डित होती है। उसमें हजारों घण्टा, टाल, किंकिणी तथा घागर बँधे रहते हैं।
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उसकी छतरी बहुत ऊँची और विशाल होती है। उसमें भाँति-भाँति की ध्‍वजा-पताकाएँ फहराती रहती हैं। वह एक छोटे मोटे नगर के ही समान होता है। सैकड़ों आदमी उसमें खड़े हो सकते हैं। चारों ओर बड़े बड़े शीशे लटकते रहते हैं। सैकड़ों मनुष्‍य स्‍वच्‍छ सफेद चंवरों को डुलाते रहते हैं।
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उसके चंदवें मूल्‍यवान रेशमी वस्‍त्रों के होते हैं तथा सम्‍पूर्ण रथ विविध प्रकार के चित्रपटों से बहुत ही अच्‍छी तरह से सजाया जाता है। उसमें आगे बहुत ही लम्‍बे और मजबूत रस्‍से बँधे होते हैं, जिन्‍हें मनुष्‍य ही खींचते हैं। भगवान के रथ को गुण्टिचा भवन तक मनुष्‍य ही खींचकर ले जाते हैं। उस समय का दृश्‍य बड़ा ही अपूर्व होता है।
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प्रात:काल रथ सिंह द्वार पर खड़ा होता है, उसमें ‘दयितागण’ भगवान को लाकर पधारते हैं, जिस समय सिंहासन से उठाकर भगवान रथ में पधराये जाते हैं, उसे ही ‘पाण्‍डु विजय’ कहते हैं। ‘दयिता’ जगन्‍नाथ जी के सेवक होते हैं।
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‘दयिता’ वैसे तो एक निम्‍न श्रेणी की जाति है, किन्‍तु भगवान की सेवा के अधिकारी होने के कारण सभी लोग उनका विशेष सम्‍मान करते हैं। उनमें दो श्रेणी हैं, साधारण दयिता तो शूद्रतुल्‍य ही होते हैं, किन्‍तु उनमें जो ब्राह्मण होते हैं, वे ‘दयितापति’ कहलाते हैं।
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अनवसर के दिनों में वे ही भगवान को बाल भोग में मिष्‍टान्‍न अर्पण करते हैं और भगवान की तबीयत खराब बताकर ओषधि भी अर्पण करते हैं। स्‍नान आदि से लेकर रथ के लौटने के दिन तक उनका श्रीजगन्‍नाथ जी की सेवा में विशेष अधिकार होता है। वे ही किसी प्रकार रस्सियों द्वारा भगवान को सिंहासन पर रथ पर पधराते हैं।
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उस समय कटक के महाराजा वहाँ स्‍वयं उपस्थित रहते हैं। महाप्रभु अपने भक्‍तों के सहित ‘पाण्‍डुविजय’ के दर्शन के लिये पहुँचे। महाराज प्रभु के दर्शन की अच्‍छी व्‍यवस्‍था कर दी थी, इसीलिये प्रभु ने भलीभाँति सुविधापूर्वक भगवान के दर्शन किये।
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दर्शन के अनन्‍तर अब रथ चलने के लिये तैयार हुआ। भारत वर्ष के विभिन्‍न प्रान्‍तों के लाखों नर नारी रथ यात्रा देखने के लिये उपस्थित थे। चारों ओर गगनभेदी जय ध्‍वनि ही सुनायी देती थी। भगवान के रथ पर विराजमान होने के अनन्‍तर महाराज प्रतापरुद्र जी ने सुवर्ण की बुहारी से पथ को परिष्‍कृत किया और अपने हाथ से चन्‍दन मिश्रित जल छिड़का।
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असंख्‍यों इन्‍द्र, मनु, प्रजापति तथा ब्रह्मा जिनकी सेवा में सदा उपस्थित रहते हैं, उनकी यदि नीच सेवा को करके महाराज अपने यश और प्रताप को बढ़ाते हैं, तो इसमें कौन सी आश्‍चर्य की बात है? उनके सामने राजा महाराजाओं की तो बात ही क्‍या है, ब्रह्मा जी भी एक साधारण जीव हैं।
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मान सम्‍मान के सहित उनकी सेवा कोई कर ही क्‍या सकता है, क्‍योंकि संसार भर की सभी प्रतिष्‍ठा उनके सामने तुच्‍छ से भी तुच्‍छ है। मान, प्रतिष्‍ठा, कीर्ति और यश के वे ही उदगम स्‍थान हैं। ऐश्‍वर्य से, पदार्थों से तथा अन्य प्रकार की वस्तुओं से कोई उनकी पूजा कर ही कैसे सकता है? वे तो केवल भाव के भूखे हैं।
(क्रमशः)

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