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*दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार ।*
*गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११७. गुण्टिचा(उद्यान मन्दिर) मार्जन*
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उद्यान तथा मन्दिरों का मार्जन होने के अनन्तर अब धोने की बारी आयी। बहुत से नये घड़े मन्दिर को धोने के लिये मंगाये गये। सभी भक्त जल से भरे हुए घड़ों को लिये महाप्रभु के पास आने लगे। महाप्रभु अपने हाथों से मन्दिर को धोने लगे।
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उस समय का दृश्य बड़ा ही चित्ताकर्षक और मनोहर था। बंगाली भक्त वैसे ही शरीर से दूबले पतले थे, तिस पर भी झाड़ू देते देते थक गये थे। वे अपनी ढीली धोती को संभालते हुए एक हाथ से घड़े को लेकर आते। किसी के हाथ में से घड़ा गिर पड़ता, वह फूट जाता है और जल फैल जाता है, उसी समय दूसरा भक्त उसे फौरन नया घड़ा दे देता।
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कोई कोई जल लाते समय गिरे हुए जल में फिसलकर धड़ाम से गिर पड़ते सभी भक्त उन्हें देखकर ताली बजा बजाकर हंसने लगते। बहुत-से केवल तालाब में से जल भी भरकर लाते थे। बहुत से ख़ाली घड़ों को देने पर नियुक्त थे। बहुत से महाप्रभु के साथ नीचे ऊपर तथा पक्की दीवालों को वस्त्रों से धो रहे थे।
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सभी भक्त हुंकार के साथ हरि-हरि पुकारते हुए जल भरकर लाते, और जल्दी से नीचे उड़ेल देते। बहुत-से जान-बूझकर प्रभु के पैरों पर ही जल डाल देते और उसे पान कर जाते। महाप्रभु का इसकी ओर ध्यान ही नहीं था, वे अपने ओढ़ने के वस्त्र से भगवान के सिंहासन को धो रहे थे।
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उसी समय एक सरल से भक्त ने एक घड़ा जल लाकर प्रभु के पैरों पर डाल दिया और सबों के देखते ही-देखते उस पादोदक का पान करने लगा। महाप्रभु की भी दृष्टि पड़ी। उन्होंने उस पर क्रोध प्रकट करते हुए कहा– ‘यह मेरे साथ कैसा अन्याय कर रहे हैं। मुझे पतित करना चाहते हैं।’
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इतना कहकर आपने अत्यन्त ही दु:खी होकर स्वरूप दामोदर को बुलाया और उनसे कहने लगे- ‘देखो, तुम्हारे भक्त ने मेरे साथ कैसा घोर अन्याय किया है। मेरे ऊपर भगवत अपराध चढ़ा दिया है। भगवान के मन्दिर में मेरा पादोदक पीया है।’
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स्वरूप दामोदर इसे अपराध ही नहीं समझते थे। उनकी दृष्टि में जगन्नाथ जी में और महाप्रभु में किसी प्रकार का अन्तर ही नहीं था, फिर भी प्रभु को शान्त करने के निमित्त उन्होंने उस भक्त पर बनावटी क्रोध प्रकट करते हुए उसे डाँटा और उसका गला पकड़कर बाहर निकाल दिया। इस पर भक्त को बड़ी प्रसन्नता हुई।
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पीछे से भक्तों के कहने पर उसने प्रभु के पैरों में पड़कर क्षमा याचना की। महाप्रभु ने हंसकर उसके गाल पर धीरे से एक चपत जमा दिया। प्रेम के जपत का पाकर वह अपने भाग्य को सराहना करने लगा। इस प्रकार दोनों मन्दिरों को तथा मन्दिर के आंगनों का भलीभाँति साफ किया।
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जब सफाई हो गयी तब प्रभु ने संकीर्तन करने की आज्ञा दी। सभी भक्त अपने अपने ढोल करतालों को लेकर संकीर्तन करने लगे। सभी भक्त कीर्तन के वाद्यों के साथ उद्दण्ड नृत्य करने लगे। भक्तवृन्द अपने आपे को भूलकर संकीर्तन के साथ नृत्य कर रहे थे।
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नृत्य करते करते अद्वैताचार्य के पुत्र गोविन्द मूर्च्छित होकर गिर पड़े। उन्हें मूर्च्छित देखकर महाप्रभु ने संकीर्तन को बंद कर देने की आज्ञा दी। सभी भक्त गोविन्द को सावधान करने के लिये भाँति-भाँति के उपचार करने लगे, किन्तु गोविन्द की मूर्छा भंग ही नहीं होती थी।
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सभी ने समझा कि गोविन्द का शरीर अब नहीं रह सकता। अद्वैताचार्य भी पुत्र को मूर्च्छित देखकर अत्यन्त दु:खी हुए। तब महाप्रभु ने उसकी छाती पर हाथ रखकर कहा- ‘गोविन्द ! उठते क्यों नहीं ! बहुत देर हो गयी, चलो स्नान के लिये चलें।’ बस, महाप्रभु के इतना कहते ही गोविन्द हरि हरि करके उठ पड़े और फिर सभी भक्तों को साथ लेकर प्रभु स्नान करने के लिये गये।
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घंटों सरोवर में सभी भक्त जलक्रीडा करते रहे। महाप्रभु भक्तों के ऊपर जल उलीचते थे और सभी भक्त साथ ही मिलकर प्रभु के ऊपर जल की वर्षा करते। इस प्रकार स्नान कर लेने के अनन्तर सभी ने आकर नृसिंह भगवान को प्रणाम किया और मन्दिर के जगमोहन मे बैठ गये।
उसी समय महाराज ने चार-पाँच आदमियों के लिये जगन्नाथ जी का महाप्रसाद भिजवाया। महाप्रभु सभी भक्तों के सहित प्रसाद पाने लगे। महाप्रसाद में छूतछात का तो विचार ही नहीं था, सभी एक पंक्ति में बैठकर साथ ही साथ प्रसाद पाने लगे।
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सार्वभौम भट्टाचार्य भी अपने आचार-विचार और पण्डितप ने के अभिमान को भुलाकर भक्तों के साथ बैठकर प्रसाद पा रहे थे। इस पर उनके बहनोई गोपीनाथर्चा ने कहा- ‘कहो, भट्टाचार्य महाशय ! आपका आचार-विचार और चौका-चूल्हा कहाँ गया?’
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भट्टाचार्य ने प्रसन्नता के स्वर में कहा- ‘आचार्य महाशय ! आपकी कृपा से मेरे चौके-चूल्हे पर चौका फिर गया। आपने मेरे सभी पापों को धुला दिया।’ इतने में ही महाप्रभु कहने लगे- ‘भट्टाचार्य के ऊपर अब भगवान की कृपा हो गयी है और इनकी संगति से हम लोगों के हृदय में भी कुछ कुछ भक्ति का संचार होने लगा है।’
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इतना सुनते ही भट्टाचार्य जल्दी से कहने लगे- ‘भगवत्कृपा न होती तो भगवान इस अभिमानी को अपनी चरण सेवा का सौभाग्य ही कैसे प्रदान करते? भगवत्कृपा का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि साक्षात भगवान अपने समीप बिठाकर भोजन करा रहे हैं।’ इस प्रकार परस्पर एक दूसरे की गुप्त प्रशंसा करने लगे। भोजन के अनन्तर सभी हरिध्वनि करते हुए उठे।
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महाप्रभु का उच्छिष्ट प्रसाद गोविन्द ने हरिदास जी को दिया और भक्तों ने भी थोड़ा थोड़ा बाँट दिया। इसके अनन्तर महाप्रभु ने स्वयं अपने करकमलों से सभी भक्तों को माला प्रदान की और उनके मस्तकों पर चन्दन लगाया। इस प्रकार उस दिन इस अदभुत लीला को करके भक्तों के सहित प्रभु अपने स्थान पर आ गये।
(क्रमशः)

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