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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग भाँणमली(भवानी) १४, (गायन समय मध्य रात्रि, राम मँजरी मतानुसार)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२६० - (गुजराती) विनती । कव्वाली ताल
मारा वाल्हा रे ! तारे शरण रहेश ।
बिनतड़ी वाल्हाने कहताँ, अनँत सुख लहेश ॥टेक॥
स्वामी तणों हूं संग न मेलूँ, बीनतड़ी कहेश ।
हूं अबला, तूं बलवँत राजा, ताहरा वना वहेश१ ॥१॥
संग रहूं ताँ सब सुख पामेँ२, अंतर थैं दहेश३ ।
दादू ऊपर दया करीनैं, आवो आंणीं वेश४ ॥२॥
२६० - २६३ में विरह पूर्वक विनय कर रहे हैं - मेरे प्रियतम ! मैं आपकी शरण रहूंगी, प्रियतम को विनय करते - करते ही मैं अपार सुख प्राप्त कर सकूंगी ।
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मैं स्वामी का साथ नहीं छोडूँगी, उनसे विनय करूँगी । प्रियतम ! आप बलवान् और विश्व के राजा हैं । मैं अबला हूं आपके अनुग्रह बिना विषय - प्रवृत्ति प्रवाह में बह१ जाऊंगी ।
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आपके संग रहूंगी तब तो सब प्रकार से सुख प्राप्त२ कर सकूंगी, नहीं तो आपके वियोग जन्य दु:ख द्वारा भीतर से जल२ जाऊंगी । अत: मुझ पर दया करके अपने वास्तव स्वरूप से मेरे हृदय में आकर विराजो४ ।
(क्रमशः)

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