शुक्रवार, 1 मई 2020

= *संयम कसौटी का अंग ११६(२५/२८)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू निर्मल शुद्ध मन, हरि रंग राता होइ ।*
*दादू कंचन कर लिया, काच कहै नहीं कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*संयम कसौटी का अंग ११६*
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मन मंयक१ मोटे२ भये, मैले मुलिक३ न मान४ ।
कर्म कलंक कसतों५ कटै, सब जग बंदै६ जान ॥२५॥
चन्द्रमा१ पूर्णिमा को बङा२ हो जाता है किन्तु मैला होने से देश३ उसका सम्मान४ नहीं करता फिर क्षय रूप कष्ट५ से उसका कलंक नष्ट होता है तब द्वितिया को सभी जगत के प्राणी उसे प्रणाम६ करते हैं । वैसे ही मन विषय सम्पर्क से मोटा होता है किन्तु विकार युक्त होने पर उसका सम्मान नहीं होता फिर गुरु ज्ञान द्वारा कर्म नष्ट हो जाता है तब सभी जगत के प्राणी उस शुद्ध मन मानव को प्रणाम करते हैं ।
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काया काच निर्मल करै, चश्मे सरीखा होय ।
जन रज्जब पङदा उठ्या, पिव को देखै सोय ॥२६॥
साधन द्वारा शरीर रूप काच को निर्मल करे तब वह चश्मे के समान हो जाता है उसका पङदा हट जाता है और वह अपने प्रियतम प्रभु को देखता है ।
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कुमति कटै कर्महु घटै१, काम क्रोध का नाश ।
जन रज्जब वा जीव के, प्रत्यक्ष ह्वै सु प्रकाश ॥२७॥
साधन द्वारा जिसकी कुबुद्धि नष्ट हो जाती है, कर्मारंभ कम१ हो जाता है, काम क्रोधादि का नाश हो जाता है, उस जीव के हृदय में प्रभु का सुन्दर प्रकाश प्रत्यक्ष रूप से भासता है ।
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अरिल -
अज्ञानी अरु भेष मोह मन अंतरा ।
इन चतुर्कर्म कर जाय नरक नहिं पंतरा ॥
क्षुधा नाम अरु गोत आयु ठिक देत रे ।
परिहां रज्जब रटि जटि राम सु चहूं समेत रे ॥२८॥
अज्ञानी भेष का आग्रह, मोह, मन की चपलता और विकार रूप विध्न इन चार प्रकार के कर्मों को करके ही नरक में जाते हैं, ये चार नहीं हो तो नरक में नहीं पङते । भूख लगने पर सात्विक भोजन करना, हरि का चिन्तन करना, गोत्र के समान आचरण करना, आयु के सम्यक् सत्कर्म में देना, इन चारों के सहित राम का भजन करके राम को भूषण में नग के समान हृदय में जटित कर लेना चाहिये ।
(क्रमशः)

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