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*दादू जैसा राम अपार है, तैसी भक्ति अगाध ।*
*इन दोनों की मित नहीं, सकल पुकारैं साध ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११२. प्रेम रस लोलुप भ्रमर भक्तों का आगमन*
क्वचित क्वचिदयं यातु स्थातुं प्रेमवशंवद: ।
न विस्मरति तत्रापि राजीवं भ्रमरो ह्रदि॥[१]
([१] प्रेम परतन्त्र भ्रमर चाहे कहीं भी रहने के लिये क्यों न चला जाय, किन्तु वहाँ भी वह हृदय से कमल को नहीं भूल सकता। सु. र. भां. २३२/४४)
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कस्तूरी को कितना भी छिपाकर रखो, उसकी गन्ध फैल ही जाती है और उसके प्रभाव को जानने वाले पुरुष दूर से ही जान जाते हैं कि यहाँ पर कीमती कस्तूरी विद्यमान है। प्रेम छिपाने से नहीं छिपता। प्रेम को विज्ञापन की आवश्यकता नहीं।
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कमल के खिलते ही मधु-लोलुप भ्रमर अपने आप ही उसके ऊपर टूट पड़ते हैं। रस होना चाहिये। भ्रमरों की क्या कमी। सर्दी के दिनों में आग जलाकर स्वतन्त्र स्थान में बैठ जाओ, तापने वाले अपने आप ही एकत्रित हो जायँगे-उन्हें बुलाने की आवश्यकता न पड़ेगी।
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प्रेमार्णव गौरांगदेव के संसर्ग में रहकर जो पहले प्रेम रस का पान कर चुके थे। उन्हें भला उनके सिवा दूसरी जगह वह रस कहाँ मिल सकता था? जिनके कर्णों में उस अद्वितीय रस की प्रशंसा भी पड़ गयी थी वे उस रसराज महासागर के दर्शन के लिये लालायित बने हुए थे।
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सार्वभौम भट्टाचार्य के मुख से प्रभु की प्रशंसा सुनकर कटकाधिपति महाराज प्रतापरुद्रदेव जी भी प्रभु के दर्शनों के लिये अन्यन्त ही उत्कण्ठित बने हुए थे। श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर के सभी कर्मचारी, पुरी के बहुत से गण्यमान पुरुष तथा अनेक साधु संत प्रभु के दर्शन की इच्छा रखते थे।
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प्रभु के पुरी पधारने का समाचार सुनकर भट्टाचार्य सार्वभौम के सहित बहुत से प्रेमी पुरुष प्रभु से मिलने के लिये आये। प्रभु ने सभी को प्रेमपूर्वक बैठने के लिये कहा। सभी प्रभु के चरणों में प्रणाम करके बैठ गये। सार्वभौम भट्टाचार्य प्रभु को सबका पृथक पृथक परिचय कराने लगे।
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सबसे पहले उन्होंने काशी मिश्र का परिचय दिया- ‘ये महाराज के कुलगुरु और राज्यपुरोहित श्रीकाशी मिश्र हैं। प्रभु के चरणों में इनका दृढ़ अनुराग है। आपके चले जाने पर ये दर्शन के लिये बड़े ही उत्कण्ठित से बने रहे। यह घर, जिसमें प्रभु ठहरे हुए हैं, इन्हीं का है।’
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प्रभु ने मिश्र जी की ओर प्रेमभरी चितवन से देखते हुए कहा- ‘मिश्र जी, मैं आज आपके दर्शनों से कृतार्थ हुआ। आप तो मेरे पिता के समान हैं। आपके घर में रहकर मैं भक्तों के सहित कृष्ण कीर्तन करता हुआ कालयापन करूँगा और नित्य आपके दर्शन पाता रहूँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये और कौन सी सौभाग्य की बात हो सकती है?’
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हाथ जोड़े हुए अत्यन्त ही विनीत-भाव से काशी मिश्र ने कहा- ‘प्रभो ! यह घर आपका ही है और सेवा करने के लिये यह दास भी सदा आपके चरणों के समीप ही बना रहेगा। आप इसे अपना निजी सेवक समझकर जो भी आज्ञा हो नि:संकोच भाव से कर दिया करें।’
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इसके अनन्तर सार्वभौम भट्टाचार्य ने जगन्नाथ जी के अन्तरंग सेवक जनार्दन भगवान के स्वर्णबेंतधारी कृष्णदास, प्रधान लिखिया शिखी माइती, उनके भाई मुरारि तथा बहिन माध्वी और महापात्र प्रहरिराज प्रद्युम्न मिश्र आदि जगन्नाथ जी के सेवकों का प्रभु को परिचय कराया। प्रभु इन सबका परिचय पाकर उनकी बड़ाई करने लगे- ‘आप लोग की धन्य हैं, जो निरन्तर श्रीभगवान की सेवा पूजा में लगे रहते हैं। मनुष्य का मुख्य कर्तव्य यही है कि वह भगवत्सेवा पूजा के अतिरिक्त मन से भी दूसरे संसारी कामों का चिन्तन न करे।’
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सभी भक्तों ने प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और महाप्रभु की आज्ञा पाकर वे अपने अपने स्थानों के लिये चले गये। इसके अनन्तर महाप्रभु ने अपने साथ जाने वाले सेवक कृष्णदास को बुलाया। उसके आ जाने पर उसे लक्ष्य करके प्रभु भट्टाचार्य सार्वभौम से कहने लगे- ‘भट्टाचार्य, आप लोगों ने इसे मेरे साथ इसलिये भेजा था कि अचेतनावस्था में यह मेरे शरीर की देख-रेख करे, इसने यथाशक्ति मेरी खूब सेवा शूश्रूषा की; किन्तु यह एक स्थान में कुछ दम्भी साधुओं के बहकाने से कामिनी कांचन का लोभ में फंस गया। यह मुझे छोड़कर उनके साथ चला गया। जिसे कामिनी कांचन का लोभ हैं, जो अपनी इन्द्रियों पर इतना भी निग्रह नहीं कर सकता, उसे अपने पास रखना मैं उचित नहीं समझता। इसलिये आप इससे कह दें कि जहाँ इसकी इच्छा हो चला जावे। अब यह मेरे साथ नहीं रह सकता।’
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प्रभु की ऐसी बात सुनकर(काला) कृष्णदास बड़े ही जोरों के साथ रुदन करने लगा। किन्तु प्रभु ने उसे फिर किसी भी प्रकार अपने साथ रखना स्वीकार नहीं किया। तब तो वह निराश होकर नित्यानन्द जी की शरण में गया और उनके चरण पकड़कर रोने लगा।
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नित्यानन्द आदि सभी भक्त इस बात को सोच रहे थे, कि ‘नवद्वीप में प्रभु के प्रत्यागमन का समाचार किस प्रकार पहुँचे। नवद्वीप के सभी भक्त प्रभु के वियोग दु:ख में व्याकुल बने हुए हैं, शचीमाता अपने प्यारे पुत्र का कुछ भी समाचार न पाने के कारण अधीर हो रही होगी, विष्णुप्रिया जी का तो एक एक दिन युग की भाँति कटता होगा, इसलिये कृष्णदास को ही नवद्वीप क्यों न भेज दें। इससे प्रभु की आज्ञा का भी पालन हो जायगा और शोकसागर में डूबे हुए सभी भक्तों को भी परम आनन्द हो जायगा।’
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यह सोचकर उन्होंने अपने मनोगत भावों को प्रभु के सम्मुख प्रकट किया। प्रभु ने उत्तर दिया- ‘श्रीपाद ! मैं तो आपका नर्तक हूँ, जैसे नचायेंगे वैसे ही नाचूँगा। आपकी इच्छा के विरुद्ध मैं कुछ नहीं कर सकता। जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये।’
(क्रमशः)

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