शुक्रवार, 1 मई 2020

*१११. नीलाचल में प्रभु का प्रत्‍यागमन*


🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*तहँ सहज रहै सो स्वामी, सब घट अंतरजामी ।*
*सकल निरन्तर वासा, रट दादू संगम पासा ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २०७)
===================
साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
.
*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
.
*१११. नीलाचल में प्रभु का प्रत्‍यागमन*
.
उद्दामदामनकदामगणाभिराम
मारामरामविररामगृहीतनाम।
कारुण्‍यधाम कनकोज्‍ज्‍वलगौरधाम
चैतन्‍यनाम परमं कलयाम धाम॥[१]
([१] श्रीकृष्‍ण कीर्तन में उन्‍मत्त हुए भक्‍तों के समूह से जो शोभित है और निरन्‍तर जिसके श्रीमुख से राम राम ऐसा शब्‍द उच्‍चारण होता रहता है, जो करुणाक का धाम तथा सुवर्ण के समान निर्मल एवं गौर कान्तिवाला है, उस चैतन्‍य नामक परम धाम का हम आश्रय लेते हैं।)
.
बड़ौदा से चलकर महाप्रभु अहमदाबाद आये, वहाँ पर दो बंगाली वैष्‍णवों से प्रभु की भेंट हुई। उनसे नवद्वीप का समाचार पाकर प्रभु की पूर्वस्‍मृति पुन: जागृत हो उठी। उनसे कुशलक्षेम पूछकर प्रभु ने द्वारका के लिये प्रस्‍थान किया। द्वारका जी के मन्दिर में जाकर प्रभु आनन्‍द में मग्‍न होकर नृत्‍य कीर्तन करने लगे।
.
वहाँ से समुद्र किनारे होते हुए सोमनाथ शिव जी के दर्शनों के लिये प्रभासक्षेत्र में आये, जहाँ पर प्राची सरस्‍वती हैं। इस प्रकार समस्‍त तीर्थों में भ्रमण करके अब प्रभु की इच्‍छा पुन: नीलाचल लौटने की हुई। इसलिये गोदावरी नदी के किनारे किनारे होते हुए पुन: विद्यानगर में पहुँच गये।
.
महाप्रभु के आने का समाचार पाते ही राय रामानन्‍द जी उसी समय प्रभु के दर्शनों के निमित्त दौड़े आये। प्रभु ने उनका गाढ़ालिंगन किया। राय ने विनीतभाव से कहा- ‘प्रभो ! इस अधम को आप भूले नहीं हैं और इसकी स्‍मृति अभी तक आपके हृदय में बनी हुई है, इस बात को स्‍मरण करके मैं प्रसन्‍नता के कारण अपने अंगों में फूला नहीं समाता। आज अपने पुन: दर्शन देकर मुझे अपनी परम कृपा का यथार्थ में ही पात्र बना लिया।’
.
प्रभु ने कहा- ‘राय महाशय, यथार्थ में तो आपके ही दर्शन से मेरे सब तीर्थ सफल हो गये थे। फिर भी मैं और तीर्थों में वैसे ही चला गया। जितना सुख मुझे यहाँ आपके साथ मिला था, उतना अन्‍यत्र कहीं भी नहीं मिला। अब फिर मैं उस आनन्‍द को प्राप्‍त करने आपके पास आया हूँ। कहावत है- ‘लाभाल्‍लोभ: प्रजायते।’ अर्थात जितना भी लाभ होता है, उतना ही अधिक लोभ बढ़ता जाता है। इसलिये अब तो यही सोचकर आया हूँ कि आपके ही साथ निरन्‍तर वास करके उस आनन्‍द रस का आस्‍वादन करता रहूँ।’
.
रामानन्‍द जी ने अत्‍यन्‍त ही संकोच के साथ कहा- ‘प्रभो ! मैंने आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके महाराज को राज काज से अवकाश देने की प्रार्थना की थी। उन्‍होंने मेरी प्रार्थना को स्‍वीकार करके बुलाया है। अब तो आपके चरणों में रहने का सम्‍भवतया सौभाग्‍य प्राप्‍त हो सके।’ प्रभु ने कहा- ‘इसीलिये तो मैं ही हूँ, अब आपको साथ लेकर ही पुरी चलूँगा।’
.
राय महाशय ने कुछ विवशता सी दिखाते हुए कहा- ‘प्रभो ! मेरे साथ चलने में आपको कष्‍ट होगा। अभी मुझे बहुत से राज काज करने शेष हैं, फिर मेरे साथ हाथी घोड़े, नौकर, चाकर बहुतसे चलेंगे। उन सबके साथ आपको कष्‍ट होगा। इसलिये आप पहले अकेले ही पुरी पधारें, फिर मैं भी पीछे से आ जाऊँगा।’
.
प्रभु ने राय रामानन्‍दजी की इस बात को स्‍वीकार किया और ये तीन चार दिन विद्यानगर में रहकर जिस रास्‍ते से आये थे, उसी से अलालनाथ पहुँच गये। अलालनाथ पहुँचने पर प्रभु ने कृष्‍णदास के द्वारा नित्‍यानन्‍द आदि के समीप अपने आने का समाचार भेजा।
.
ये लोग प्रभु की प्रतीक्षा में उसी प्रकार बैठे हुए थे जिस प्रकार अंगदादि वानर समुन्‍द्र को पार करके सीता जी की खोज के लिये हुए श्रीहनुमान जी की प्रतीक्षा में समुद्र के किनारे बैठे थे। प्रभु का समाचार पाते ही नित्‍यानन्‍दादि सभी भक्‍त प्रभु से मिलने के लिये दौड़े आये। रास्‍ते में दूर से ही आते हुए उन्‍होंने प्रभु को देखा।
.
प्रभु को देखते ही सभी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के चरणों में साष्‍टांग प्रणाम किया। प्रभु ने उन सबको प्रभु क्रमश: अपने हाथों से उठा उठाकर प्रेमालिंगन दान दिया। आज दो वर्षों के पश्‍चात प्रभु का प्रेमालिंगन पाकर सभी प्रेम में बेसुध हो गये और प्रेम के अश्रु बहाते हुए प्रभु के पीछे पीछे चले।

इतने में सामने से सार्वभौम भट्टाचार्य तथा गोपीनाथाचार्य प्रभु को आते हुए दिखायी दिये। प्रभु ने अस्‍त व्‍यस्‍त भाव से दौड़कर उनका जल्‍दी से आलिंगन करना चाहा, किन्‍तु वे इससे पहले ही प्रभु के चरणों में गिर पड़े। प्रभु ने उनको स्‍वयं उठाया, उनका आलिंगन किया और उनके वस्‍त्रों में लगी हुई धूलि को अपने हाथों से पोंछा।
.
सभी लोग प्रभु के पीछे पीछे चले। सबसे पहले महाप्रभु जगन्‍नाथ जी के दर्शन के लिये गये। वहाँ के कर्मचारी प्रभु की प्रतीक्षा में सदा चिन्तित से बने रहते थे। सहसा प्रभु के आगमन का समाचार सुनकर सभी आनन्‍द के सहित नृत्‍य करने लगे। प्रभु ने भगवान को साष्‍टांग प्रणाम किया और भाँति-भाँति से स्‍तुति करने लगे।
.
पुजारी ने आकर माला और प्रसाद प्रभु को भेंट किया। बहुत दिनों के पश्‍चात पुरुषोत्तमभगवान का महाप्रसाद पाकर प्रभु परम प्रसन्‍न हुए और प्रसाद को उसी समय उन्‍होंने पा लिया। फिर भक्‍तों के सहित मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए प्रभु भट्टाचार्य सार्वभौम के घर आये। सार्वभौम ने प्रभु को भिक्षा के लिये निमन्त्रित किया और सभी भक्‍तों के सहित उन्‍होंने प्रभु को भिक्षा करायी।
.
प्रभु के रहने के लिये भट्टाचार्य ने महाराज प्रतापरुद्र जी को परामर्श करके महाराज के पुरोहित काशी मिश्र के एकान्‍त-निर्जन स्‍थान में पहले से ही प्रबन्‍ध कर रखा था। प्रभु को वह स्‍‍थान बहुत पसन्‍द आया और प्रभु उसी में रहने लगे।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें