गुरुवार, 28 मई 2020

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*दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ ।*
*जिह्वा आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्कर्मी पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *प्रेमा -भक्ति*
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आमेर नरेश मानसिंह के छोटे भाई माधवसिंह की पत्नि रत्नावती भगवान की प्रेमी भक्त थी । प्रथम तो माधवसिंह ने उससे विरोध किया किन्तु जब ज्ञात हो गया कि वह भगवान की सच्ची भक्त है, तब रत्नावती के सामने जाकर दण्डवत् करने लगे । रत्नावती की सखी ने कहा - "महाराज दण्डवत कर रहे हैं ।" रत्नावती - दण्डवत तो भगवान को करें । सखी आप इनकी ओर देंखे तो सही । रत्नावती - मेरे नेत्र तो भगवान की ओर लग गये हैं, अब इनमें अन्य को देखने की शक्ति नहीं रही । इससे सूचित होता है कि भगवत् प्रेमी भगवान बिना अन्य को नेत्र भर कर भी नहीं देख सकता ।
प्रेमी चख प्रियतम बिना, अन्य लखे नहिं कोय ।
रत्नावति ने यह कहा, सुनिये मन दे सोय॥३०९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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