सोमवार, 4 मई 2020

*अहंकार कब जाता है?*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान ।*
*वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ हैरान का अंग)*
================
*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
“जीव तो स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप है, परन्तु इसी माया या अहंकार से वे नाना उपाधियों में पड़े हुए अपने स्वरूप को भूल गए हैं ।
“एक एक उपाधि होती है, और जीवों का स्वभाव बदल जाता है । किसी ने काली धारीदार धोती पहनी कि देखना, प्रेमगीतों की तान मुँह से आप से आप ही आप निकल पड़ती है, और ताश खेलना, सैरसपाटे के लिए निकलना तो हाथ में छड़ी लेकर-ये सब आप ही आप जुट जाते हैं । चाहे दुबला-पतला ही हो परन्तु बूट पहनते ही सीटी बजाना शुरू हो जाता है; सीढ़ियों पर चढ़ते समय साहबों की तरह उछलकर चढ़ता है ! मनुष्य के हाथ में कलम रहे तो उसका यह गुण है कि कागज का जैसा-तैसा टुकड़ा पाते ही वह उस पर कलम घिसना शुरू कर देता है ।
.
“रुपया भी एक विचित्र उपाधि है । रुपया होते ही मनुष्य एक दूसरी तरह का हो जाता है । वह पहले जैसा नहीं रह जाता । यहाँ एक ब्राह्मण आया जाया करता था । बाहर से वह बड़ा विनयी था । कुछ दिन बाद हम लोग कोन्नगर गए, हृदय साथ था । हम लोग नाव पर से उतरे कि देखा, वही ब्राह्मण गंगा किनारे बैठा हुआ है । शायद हवाखोरी के लिए आया था । हम लोगों को देखकर बोला, ‘क्यों महाराज, कहो कैसे हो?’ उसकी आवाज सुनकर मैंने हृदय से कहा, ‘हृदय, सुना, इसके धन हो गया है, इसी से आवाज किरकिराने लगी’ हृदय हँसने लगा ।
.
“किसी मेढ़क के पास एक रुपया था । वह एक बिल में रखा रहता था । एक हाथी उस बिल को लाँघ गया । तब मेढ़क बिल से निकलकर बड़े गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने ! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय !’ रूपये का इतना अहंकार होता है ! 
.
*अहंकार कब जाता है?- ब्रह्मज्ञान की अवस्था सप्तभूमि*
“ज्ञानलाभ होने से अहंकार दूर हो सकता है । ज्ञानलाभ होने से समाधि होती है । जब समाधि होती है, तभी अहंकार जाता है । ऐसा ज्ञानलाभ बड़ा कठिन है ।
.
“वेदों में कहा है कि मन सप्तम भूमि पर जाने से समाधि होती है । समाधि होने से ही अहंकार दूर हो सकता है । मन प्रायः तीन भूमियों में रहता है । लिंग, गुदा और नाभि ये ही वे तीन भूमियाँ हैं । तब मन संसार की ओर-कामिनी-कांचन की ओर खिंचा रहता है । जब मन हृदय में रहता है तब ईश्वरी ज्योति के दर्शन होते हैं । वह मनुष्य जाति देखकर कह उठता है-‘यह क्या, यह क्या है !’ इसके बाद मन कण्ठ में आता है । तब केवल ईश्वर की ही चर्चा करने और सुनने की इच्छा होती है । कपाल या भौहों के बीच में जब मन आता है तब सच्चिदानन्द-रूप दीख पड़ता है । उस रूप को गले लगाने और उसे छूने की इच्छा होती है, परन्तु छुआ नहीं जाता । लालटेन के भीतर की बत्ती को कोई चाहे देख ले पर उसे छू नहीं सकता, जान पड़ता है कि छू लिया, परन्तु छू नहीं पाता । जब सप्तम भूमि पर मन जाता है तब अहं नहीं रह जाता, समाधि होती है ।”
.
विजय- वहाँ पहुँचने जब ब्रह्मज्ञान होता है, तब मनष्य क्या देखता है?
श्रीरामकृष्ण-सप्तम भूमि में मन के जाने पर क्या होता है, मुँह से नहीं कहा जा सकता । नमक की गुड़िया समुंदर नापने गई । किन्तु जैसे पानी में उतरी वैसे ही गल गई अब समुंदर के गहराई की खबर कौन देगी? जो देगी वही तो उसके साथ मिल गई । सप्तम भूमि में मन का नाश होता है, समाधि होती है । क्या अनुभव होता है वह मुँह से कहा नहीं जाता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें