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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*रोक न राखै, झूठ न भाखै, दादू खरचै खाइ ।*
*नदी पूर प्रवाह ज्यों, माया आवै जाइ ॥१०५॥*
सत्पुरुषों के पास माया नदी के पूर के प्रवाह की तरह आती जाती रहती है । वे उसका संचयन नहीं करते, किन्तु उसको खा लेते हैं या दूसरों को दे देते हैं । लिखा है कि- इकट्ठे किये हुए धन की त्याग ही रक्षा है । जैसे तालाब के मध्य स्थित पानी का प्रवाह ही उसकी रक्षा है ।
जो धन की रक्षा के लिये उसको जमीन में गाड़कर रखता है वह उसके नीचे से नीचे जाने का रास्ता पहले से ही स्वयं बना रहा है ।
जो धन को स्वयं के सुख के लिये भी खर्च नहीं करता केवल उसका संग्रहमात्र करता है । वह केवल क्लेश ही पाता है और किसी दूसरे के लिये ही संग्रह करता है ।
दान तथा उपभोग के बिना यदि कोई अपने को धनवान् माने तो उसी धन से हम भी धनी क्यों नहीं हो सकते हैं ।
अतः धन का दान करो या उसका उपभोग कर लो । उसका संग्रह मत करो, क्योंकि हम स्वयं देख रहे हैं कि मधुमक्खी के संग्रह किये हुए शहद को दूसरे लोग ले जाते हैं ।
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*सदका सिरजनहार का, केता आवै जाइ ।*
*दादू धन संचय नहीं, बैठा खुलावै खाइ ॥१०६॥*
भगवान् भक्तों को बहुत अधिक धन देता है । परन्तु भट उस धन का संचय नहीं करते किन्तु दरिद्रनारायण की सेवा में लगा देते हैं ।
लिखा है कि- धन पैर की धूली के समान तुच्छ है । यौवन नदी के वेग की तरह क्षणभंगुर है । आयु भी हिलते हुई जलबिन्दु की तरह चंचल है और जीवन झाग की तरह नष्ट होने वाला है । अतः जो धन के द्वारा धर्म उपार्जित नहीं करता वह निन्द्बुद्धि वाला है । क्योंकि वह धर्म ही स्वर्ग को देने वाला है । अन्त में वह वृद्धावस्था आने पर पश्चात्ताप करता हुआ शोकरुपी आग में जलता है । अतः धन का सदुपयोग करो ।
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*॥ माया ॥*
*जोगिनी ह्वै जोगी गहै, सूफिनी ह्वै कर शेख ।*
*भक्तिनी ह्वै भक्ता गहै, कर कर नाना भेख ॥१०७॥*
यह माया योगियों के घर में योगिनी सूफी शेखों के घरों में सूफनी शेखनी तथा भक्तों के घरों में भक्तिन होकर सब को माया चक्र में डाल देती है । अतः जो इस स्त्री रुपी माया से बच गये उनको धन्यवाद है ।
भागवत में- भगवान् के चरण कमलों को भजने वाले समचित साधु पुरुषों को धन के अभीमानी असत्पुरुषों में रहने वाले सत्पुरुषों से जो उपेक्ष्य माने गये हैं । उनसे क्या लेना देना है ।
अन्य रजोगुणी विषयों के सेवन से इतना बुद्धि का नाश नहीं होता जितना लक्ष्मी तथा कुल के मद से बुद्धि का नाश होता है । क्योंकि वहां पर स्त्री प्रसंग, जूआ, मांस, मदिरा का सेवन होता रहता है ।
(क्रमशः)

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