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*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु* *भ्रातृ भक्ति*
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मोहन भाई के गुरुजी के पिता का श्राद्ध था । गुरुजी सब लड़कों से कुछ न कुछ लाने की आज्ञा दे रहे थे । मोहन ने भी पूछा - गुरुजी ! मैं क्या लाऊ ।" गुरु - "बेटा ! तुझे कुछ भी नहीं लाना होगा ।"
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मोहन ने आग्रह किया तब गुरुजी बोले - 'अच्छा एक लोटा दूध ले आना ।' मोहन ने माँ से दूध माँगा । माँ बोली - 'गोपाल भैया से माँगना ।'
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मोहन ने गोपाल से दूध मांगा, गोपाल ने ला दिया । वह दूध लेकर गुरुजी के पास गया और बोला - 'मैं दूध ले आया हूं ।' गुरुजी अन्य लड़कों से लायी सामग्री देख रहे थे, उसकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया ।
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मोहन ने कई बार कहा तब झुझंला कर बोले - 'जरा सा दूध लाकर यह लड़का कान खाये जा रहा है, जैसे इसने हमें निहाल ही कर दिया हो । इसका दूध किसी बर्तन में डाल कर हटाओ इसको ।' लोटा ले नौकर दूध खाली करने लगा किन्तु कई बर्तन भरने पर भी लोटा खाली नहीं हुआ ।
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गुरुजी ने पुछा - 'तू दूध कहां से लाया ?' मोहन - 'गोपाल भाई से। गुरूजी जानते थे कि इसके कोई भाई नहीं है । मोहन से सब बात जानकर गुरु प्रसन्न हुये । मोहन के दूध की खीर बड़ी अदभुत बनी सांयकाल जाते समय गुरु यह कहकर कि गोपाल भाई का दर्शन मुझे भी करा, मोहन के साथ हो लिये ।
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वन में जाते ही मोहन ने पुकारा । तब आवाज आई - 'आज तू अकेला नहीं है तुझे डर भी नहीं लग रहा है ।' मोहन - 'गुरुजी को दर्शन दो ।' गोपाल - 'गुरुजी दर्शन के योग्य नहीं फिर भी मेरा प्रकाश उन्हें दिखेगा ।' गुरु ने महान प्रकाश देखा और कृत कृत्य हो गये । इससे सूचित होता है कि भ्रातृ भाव के भक्त की इच्छा पूर्ण करते हैं ।
भ्रातृ भाव के जन की करे, हरि अभिलाषा पूर्ण ।
मोहन को गोपाल ने, दूध ला दिया तूर्ण ॥२७६॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
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