शुक्रवार, 22 मई 2020

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*दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।*
*मस्तक मेरे कर धर्या, दिक्ष्या अगम अगाध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु*, *भक्त*
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संतवर दादूजी जब ग्यारह वर्ष के थे तब एक दिन के चतुर्थ पहर(दोपहर) में अहमदाबाद नगर में काँकरिया तालाब पर अन्य बालकों के संग खेल रहे थे । उसी समय वहां एक वृद्ध संत के रूप में भगवान पधारे । उन्हे देखकर दूसरे बालक तो दौड़ गये किन्तु दादूजी वहां ही खड़े रहे । जब संत दादूजी के पास आये तब दादूजी ने उनके चरण छूकर सप्रेम प्रणाम किया और उनके पास एक पैसा था वह संत को भेंट किया । संत प्रसन्न होकर बोले - 'जा, पहले जो वस्तु मिले वही इसकी ले आ ।' बालक दौड़ मार्ग में सर्व प्रथम पान की दुकान मिली। पान लाकर दे दिया । उन सन्त भेषधारी भगवान ने पान खाया और बालक दादूजी को प्रसाद देते हुये उनके शिर पर ज्यों ही अपना कर कमल रखा त्यों ही बालक की दिव्य दृष्टि हो गई ।
ईश्वर लधु भी भेंट पर, जन पर होत प्रसन्न ।
दादू पैसा एक दे, भये विश्व में धन्न ॥३५१॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^

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