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*दादू कहाँ जाऊँ ?*
*कौण पै पुकारूँ ? पीव न पूछै बात ।*
*पीव बिन चैन न आवई, क्यों भरूँ दिन रात ? ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१०९. दक्षिण के शेष तीर्थों में भ्रमण*
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पण्ढरपुर में भीमा नदी में स्नान करके महाप्रभु कृष्णवीणा नदी के किनारे आये। वहाँ ब्राह्मणों के समीप से प्रभु ने श्रीविल्वमंगलकृत ‘कृष्णकर्णामृत’ नामक अपूर्व रसमय ग्रन्थ का संग्रह किया। ब्रह्मसंहिता और कृष्णकर्णामृत इन दोनों पुस्तकों को यत्नपूर्वक साथ लिये हुए प्रभु ताप्ती नदी के निकट आये। वहाँ पुण्यतोया ताप्तीनदी में स्नान करके महिष्मतीपुर होते हुए वे नर्मदा जी के किनारे आये, वहाँ ऋष्यमूक पर्वत को देखते हुए, दण्डकारण्य के समस्त तीर्थों को पावन करते हुए सप्तलाल तीर्थ का उद्धार किया।
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महाप्रभु ने नीलगिरी प्रदेश में भ्रमण करते समय असंख्य लोगों को श्रीकृष्ण प्रेम में उन्मत्त बनाया। इसी प्रकार भ्रमण करते हुए गुर्जरी नगर में आकर उपस्थित हुए। यहाँ पर एक अर्जुन नाम के शुष्क वेदान्ती पण्डित को प्रभु ने श्रीकृष्ण तत्त्व समझाया और उसे प्रेम प्रदान किया।
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गुर्जरी नगर में महाप्रभु बीजापुर के पार्वत्य प्रदेश में भ्रमण करते हुए और अनेक पुण्य तीर्थों में दर्शन, स्नान, मार्जन और आचमन करते हुए पूर्ण नगर में पहुँचे। वहाँ एक सरोवर के निकट प्रभु ने वास किया। वह नगर बड़ा ही समृद्धशाली था, उसमें संस्कृत के बहुत से विद्वान पण्डित थे और अनेक पाठशालाएँ थीं।
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महाप्रभु को उन दिनों श्रीकृष्ण विरह का अत्यन्त ही प्राबल्य था, वे सरोवर के तीर पर बैठ हुए जोरों से रोते हुए चिल्ला रहे थे ‘हाँ प्राणनाथ! हा हृदयेश्वर! तुम कहाँ हो, दर्शन दो। प्राणवल्लभ! शीघ्र आओ, तुम कहाँ छिपे हो।’ प्रभु के करुण क्रन्दन को सुनकर बहुत से नर नारी एकत्रित हो गये। उनमें कुछ अपने को तत्त्वज्ञानी मानने वाले शुष्क तार्किक भी थे।
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प्रभु अत्यन्त ही दीनभाव से उनसे पूछने लगे- ‘आप कृपा करके मेरे प्राणनाथ का पता जानते हों तो बताइये। वे कहाँ है, मुझे छोड़कर वे कहाँ छिपे गये?’
उन पण्डितों में से एक अत्यन्त ही शुष्क हृदयवाला पण्डित बोल उठा- ‘तेरे कृष्ण इस जल में छिपे हैं।’ बस, इतना सुनना था कि महाप्रभु उसी क्षण छलाँग मारकर जल में कूद पड़े।
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लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। बहुत से पुरुष उसी क्षण सरोवर में कूद पड़े और प्रभु को जल से बाहर निकाला। इस पर सभी लोग उस पण्डित को धिक्कार देने लगे। वह भी अपना सा मुँह लेकर मारे शर्म के उसी क्षण चला गया।’
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यहाँ से चलकर प्रभु भोलेश्वर होते हुए जिजूरी नगर में पहुँचे। यहाँ पर खाण्डवादेव का बड़ा भारी मन्दिर है। यहाँ एक बड़ी ही बुरी प्रथा है। जिस कन्या का विवाह नहीं होता उसे माता-पिता देवता के अर्पण कर देते हैं और उसे देव दासी कहते हैं। उनमें अधिकांश दुश्चरित्रा और व्याभिचारिणी होती हैं।
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महाप्रभु ने जब यह बात सुनी तब वे स्वयं इन अभागी पतिता नारियों को देखने के लिये खाण्डवादेव के मन्दिर में गये। प्रभु ने अपनी आँखों से उन अभागिनियों की दुर्दशा देखी। उनकी दयनीय दशा देखकर दयामय श्रीचैतन्य उनसे बोले- ‘देवियो ! तुम धन्य हो, तुम्हारा ही जीवन सार्थक है, अन्य स्त्रियों के पति तो हाड़-मांस के पुतले नश्वर शरीर वाले मनुष्य होते हैं, किन्तु तुम्हारे पति तो साक्षात श्रीहरि हैं।
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गोपियों ने श्रीहरि को पति बनाने के लिये असंख्यों वर्ष तप किया था। असल में सच्चे पति तो वे ही नन्दनन्दन हैं, इसलिये तुम सब प्रकार से मन लगाकर श्रीकृष्ण नाम का ही कीर्तन किया करो। श्रीहरि के ही नाम का सदा स्मरण किया करो। उनका नाम पतितपावन है, सच्चे हृदय से जो एक बार भी यह कह देता है कि मैं तुम्हारी शरण हूँ, तो वे सभी पापों को क्षमा कर देते हैं।
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श्रीभगवन्नाम-संकीर्तन में अनन्त शक्ति है।’ यह कहकर महाप्रभु स्वयं अपने दोनों बाहुओं को उठाकर उच्च स्वर से हरि-नाम-संकीर्तन करने लगे। उस समय प्रेम के भावावेश में उनके दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही थी, शरीर के रोम खड़े हुए थे, रोमकूपों में से पसीना फब्बारे की तरह निकल रहा था।
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उनकी ऐसी दशा देखकर सभी देव दासियाँ अपने नारी-सुलभ कमनीय कण्ठ से-
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥
इस महामन्त्र का उच्च स्वर में कीर्तन करने लगीं। सम्पूर्ण देवालय महामन्त्र की ध्वनि से गूँजने लगा। उस संकीर्तन की बा़ढ़ में उन देव दासियों के समस्त पाप धुलकर बह गये, वे भगवन्नाम के प्रभाव से निष्पाप बन गयीं।
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उनमें से जो प्रधान देव-दासी थी, उसका नाम इन्दिरा था, वह आकर प्रभु के चरणों में गिर पड़ी और अत्यन्त ही दीनभाव से कहने लगीं- ‘प्रभो! व्यभिचार करते करते मेरी यह अवस्था हो गयी। अब ऐसी कृपा कीजिये कि श्रीहरि के चरणों में भक्ति हो।’ प्रभु ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा-‘देवि ! श्रीकृष्ण दयामय हैं, वे दीनों पर अत्यन्त ही शीघ्र कृपा करते हैं। तुम उनका ही भजन करो, उन्हीं के शरण में जाओ, तुम्हारा कल्याण होगा।’
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प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके उसने अपना सर्वस्व दीन-हीन गरीबों को बाँट दिया और स्वयं भिखारिणी का वेष बनाकर मन्दिर के द्वार पर भिक्षान्न से निर्वाह करती हुई, अहर्निश श्रीकृष्ण-कीर्तन में मग्न रहने लगी। और भी कई देव दासियों ने उसके पथ का अनुसरण किया।
(क्रमशः)

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