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*साधु मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि की प्यास ।*
*दादू संगति साधु की, अविगत पुरवै आस ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*११०. नौरो जी डाकू का उद्धार*
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संसारसिन्धुतरणे हृदयं यदि स्यात।
संगीर्तनामृतरसे रमते मनश्चेत।
प्रेमाम्बुधौ विहरणे यदि चित्तवृत्ति
श्चैतन्यचन्द्रचरणं शरणं प्रयातु॥[१]
{[१] संसार सागर को पार करने की यदि तुम्हारे हृदय में प्रबल इच्छा है, यदि संकीर्तनामृतरस पान करने के लिये तुम्हारा मन चाहता है, यदि प्रेमपयोधि में प्रेमपूर्वक विहार करने के लिये तुम्हारे चित्त की वृत्तियाँ छटपटाती हैं तो तुम श्रीचैतन्य-चरणों की शरण लो। (तुम्हारा मंगल होगा)। प्रबोधानन्द सरस्वती}
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प्रेम में न भय है, न द्वेष। जिसने प्रेम का प्याला पी लिया है, उसे संसार में सर्वत्र उसी एक परम प्रेमास्पद प्रभु का ही रूप दिखायी देता है, जब सभी अपने प्रेमास्पद हैं तो भय किसका। भय तो दूसरे से होता है। अपने-आपसे किसी को भय नहीं। द्वेष गैर से किया जाता है, जब सभी श्यामसुन्दर के हैं तब द्वेष किससे करें और क्यों करें?
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महाप्रभु गौरांगदेव इस प्रकार खाण्डवादेव में देव दासियों को श्रीकृष्ण-कीर्तन का उपदेश देकर आगे को चले। वहाँ से थोड़ी दूर पर एक चोरानन्दी वन था, इस वन में बहुत से डाकू बसते थे। उन सब डाकूओं का दलपति नौरोजी डाकू था, वह बड़ा ही क्रूर और हिसंक था। सभी लोग उसके नाम से थर्राते थे। उस प्रदेश में उसके नाम का आतंक था।
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जब प्रभु ने उस वन में प्रवेश करने का विचार किया तो लोगों ने उन्हें वहाँ जाने से मना किया और कहा कि ‘वे डाकू बड़े हिंसक हैं, आप का उधर से जाना ठीक नहीं है।’ किन्तु महाप्रभु उनकी बात को क्यों मानने लगे। उन्होंने कहा - ‘भाई, डाकू लोग तो रुपये-पैसे के लिये लोगों को मारते हैं। हम घर घर के भिखारी संन्यासी हैं, हमें मारकर वे क्या लेंगे? वे यदि हमारी जान ही लेना चाहते हों तो भले ही ले लें। इस शरीर से यदि किसी का भी काम चल जाय तो बड़ा उत्तम है।’
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ऐसा कहकर प्रभु उस वन में घुस गये। वहाँ एक वृक्ष के नीचे प्रभु पड़ रहे और शनै: शनै: सुमधुर हरि नाम संकीर्तन करने लगे। दलपति नौरोजी ने सुना कि कोई संन्यासी यहाँ हमारे जंगल में आया है, वह अपने दल के अनेक पुरुषों के साथ प्रभु के पास आया और प्रभु को भोजन के लिये निमन्त्रित किया तथा अपने स्थान पर चलने का आग्रह किया। प्रभु ने कहा- ‘हम तो संन्यासी हैं, वृक्षतले ही हमारा आसन ठीक है, रही भोजन की बात, भिक्षा ही हमारा एकमात्र आधार है, आप जो भिक्षा ले आवेंगे उसे हम सहर्ष स्वीकार करेंगे।’
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प्रभु की ऐसी आज्ञा पाकर उसने अपने दल के आदमियों को आज्ञा दी; वे बात की बात में भाँति-भाँति की खाने की सामग्री ले आये। महाप्रभु श्रीकृष्ण प्रेम में विभोर थे, उन्हें शरीर का ज्ञान ही नहीं था, वे प्रेम में गदगद कण्ठ से उन्मत्त की तरह कीर्तन कर रहे थे, कभी कभी नाचने भी लगते थे। नौराजी अपने दल बल सहित प्रभु को घेरे बैठा था।
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महाप्रभु के इस अभूतपूर्व अलौकिक प्रभु प्रेम को देखकर उसका भी पत्थर जैसा हृदय पसीज गया। उसने जीवनभर लोगों की हिंसा की थी और डाके ही डाले थे। इस समय उसकी अवस्था साठ वर्ष के लगभग थी। महाप्रभु के अलौकिक प्रेम ने उस साठ वर्ष के बूढ़े डाकू के ऊपर भी अपना जादू डाल दिया।
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वह धीरे धीरे प्रभु के पादपपद्मों को पकड़कर कहने लगा- ‘स्वामी जी ! आप यह कौन सा मन्त्र उच्चारण कर रहे हैं, मुझे भी इस मन्त्र का उपदेश दीजिये। पता नहीं आपने मेरे ऊपर क्या जादू डाल दिया है कि अब मेरा मन हिंसा और डकैती से बिलकुल हट गया है। अब मैं भी आपके चरणों की शरण में रहकर निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तन करना चाहता हूँ।
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आप मुझे इस मन्त्र का उपदेश दीजिये। भगवन ! मेरा जन्म वैसे तो ब्राह्मण-वंश में ही हुआ है। किन्तु बाल्यकाल से ही मैंने हिंसा और डकैती का काम किया है, आज तक कभी भी मेरे मन में इन कामों से वैराग्य नहीं हुआ, किन्तु न जाने आज आपके दर्शन से मुझे क्या हो गया कि अब कुछ अच्छा ही नहीं लगता।
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अब मैं आपके चरणों को नहीं छोडूँगा ! आप मुझे अपनी पदधूलि प्रदान करके कृतार्थ कीजिये और जिस मन्त्र के संकीर्तन से आप इतने आनन्दमग्न हो रहे हैं उसका उपदेश मुझे भी कीजिये।’
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प्रभु ने उसकी ऐसी आर्तवाणी सुनकर कहा- ‘नौराजी ! तुम बड़े ही भाग्यशाली हो, जो इस वृद्धावस्था में तुमको निर्वेद हुआ। श्रीकृष्ण कीर्तन ही संसार में सार है। ये धन रत्न तो सभी नश्वर और क्षणभंगुर हैं। तुम घबड़ाओ मत, भगवान तो प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि चाहे कोई कितना भी बड़ा दुराचारी क्यों न हो, यदि वह अनन्यभाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिये।
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दयालु श्री हरि ने तुम्हारे ऊपर परम कृपा की जो तुम्हें सदबुद्धि प्रदान की, अब तुम निरन्तर हरि नाम कीर्तन ही किया करो।’ ऐसा उपदेश करके प्रभु ने उसे महामन्त्र की दीक्षा दी। प्रात:काल उठकर प्रभु ने चलने को तैयार हुए तो नौराजी ने भी अपने सभी अस्त्र-शस्त्र फेंक दिये और अपने दल के सब आदमियों को बुलाकर वह गदगद कण्ठ से कहने लगा-
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‘भाइयो ! हम सब इतने दिन साथ रहे, तुम्हें मैं समय समय पर उचित-अनुचित आज्ञा देता रहा और तुमने भी प्राणों की कुछ भी परवा न करके मेरी समस्त आज्ञाओं का पालन किया। साथ में रहने से और नित्य के व्यवहारों से गलती और अपराधों का होना स्वाभाविक ही है; इसलिये भाई ! मुझसे जिसका भी अपकार हुआ हो, वह मुझे सच्चे हृदय से क्षमा कर दे। अब मैं अपने भगवान की शरण में जा रहा हूँ।
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जिनकी शरण में जाने से पापी-से-पापी भी सुखी और निर्भय हो जाता है। अब मैं किसी जीव की हिंसा न करूँगा। आज से मेरे लिये सभी प्राणी उस परमपिता परमात्मा के पुत्र हैं। जान बूझकर अब मैं एक चींटी की भी हिंसा नहीं करूँगा। बाल्यकाल से अब तक मैंने धन के लिये न जाने कितने पाप किये हैं, कितनी हिंसाएँ की हैं।
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अरबों-करोड़ों रुपये इन हाथों से लूटे हैं और खर्च किये हैं। अब मैं द्रव्य को अपने हाथों से स्पर्श भी न करूँगा। अब तक हजारों आदमियों का मेरे द्वारा प्रतिपालन होता था, आज से मैं स्वयं भिखारी बन गया हूँ, अब पेट की ज्वाला को बुझाने के लिये मैं द्वार द्वार पर मधुकरी भिक्षा करूँगा। तुम लोग मुझे क्षमा करो और ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने शेष जीवन को इसी प्रकार श्रीकृष्ण प्रेम में पागल बनकर बिताऊँ।’
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नौरोजी ने ऐसी बात सुनकर उसके दल के सभी डाकू रोने लगे। उसका दल छिन्न भिन्न हो गया, बहुतों ने डाका डालने का काम छोड़ दिया। नौरोजी प्रभु के साथ चल दिया। आज तक बहुत से आदमियों ने प्रभु के साथ चलने की प्रार्थना की थी, किन्तु प्रभु ने किसी को भी साथ नहीं लिया।
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परम भाग्यवान नौरोजी के भाग्य की कोई कहाँ तक प्रशंसा करे, जिसे प्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक साथ चलने की अनुमति दे दी। आगे आगे महाप्रभु, उनके पीछे गोविन्द दास और सबसे पीछे नौरोजी संन्यासी चलते थे। इस प्रकार चलते चलते खण्डला में पहुँचे।
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वहाँ पर लोगों ने महाप्रभु का खूब सत्कार किया, वहाँ से चलकर प्रभु नासिक गये और वहाँ पंचवटी में नृत्य-कीर्तन करते हुए आनन्द में मग्न हो गये। नौरोजी महाप्रभु के श्रीअंग के पसीने को बार बार पोंछते रहते थे। उस समय के बड़ौदा के महाराज बड़े ही भक्त थे।
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उन्होंने बहुत द्रव्य लगाकर भगवान का एक मंदिर बनवाया था, उसमें स्वयं ही भगवान की पूजा तथा साधु महात्माओं का सत्कार करते थे। महाप्रभु श्रीकृष्ण की मूर्ति के दर्शन करके प्रेमानन्द में मग्न होकर नृत्य करने लगे। महाराज उनके अद्भुत नृत्य और अलौकिक प्रेम के भावों को देखकर मुग्ध हो गये। उन्होंने महाप्रभु का बहुत सत्कार किया।
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बहुत कुछ भेंट करने की इच्छा की किन्तु महाप्रभु ने संन्यास धर्म के अनुसार मुष्टि-भिक्षा के अतिरिक्त कुछ भी ग्रहण नहीं किया। बड़ौदा में ही आकर नौरोजी ने महाप्रभु के सामने अपने इस नश्वर शरीर का त्याग किया। महाप्रभु ने रोते रोते आत्मीय पुरुष की तरह एक भक्त वैष्णव की भाँति उसे अपने करकमलों से समाधि में सुला दिया। इस प्रकार जन्म से हिंसा और धन अपहरण करने वाला एक डाकू महाप्रभु की शरण आने से अमर हो गया।
(क्रमशः)

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