गुरुवार, 28 मई 2020

= २८७ =

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग टोडी(तोडी) १६ (गायन समय दिन ६ से १२)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
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२८७ - परिचय । कोकिल ताल
सुन्दर राम राया ।
परम ज्ञान परम ध्यान, परम प्राण आया ॥टेक॥
अकल सकल अति अनूप, छाया नहिं माया ।
निराकार निराधार, वार पार न पाया ॥१॥
गँभीर धीर निधि शरीर, निर्गुण निरकारा ।
अखिल अमर परम पुरुष, निर्मल निज सारा ॥२॥
परम नूर परम तेज, परम ज्योति प्रकाशा ।
परम पुँज परापरँ, दादू निज दासा ॥३॥
साक्षात्कार की स्थिति बता रहे हैं, निर्गुण के उत्कृष्ट ध्यान तथा उत्कृष्ट ज्ञान के द्वारा परम सुन्दर विश्व को सत्ता मात्र से चलाने वाला राजा, परम प्राण रूप सब में रमने वाला राम अपने आत्म - स्वरूप से ही भास आया है । 
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वह काल रहित, सर्व रूप, अति अनुपम, निराकार होने से छाया तथा माया रहित निराधार है । उसका आदि अन्त नहीं प्राप्त होता । 
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वह अति गँभीर है, उसका स्वरूप धैर्य की निधि रूप है किन्तु निर्गुण होने से अकार का वाच्य विष्णु नहीं है और वह परम पुरुष अखिल आकारों में अमर भाव से स्थित है । ऐसा उसका निर्मल वास्तविक स्वरूप है । 
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वह परम तेज रूप है, उस परम ज्योति का प्रकाश ज्ञान रूप से सबमें फैला हुआ है । वह सब प्रकार की परमता की राशि है, माया से परे है, हम उसी के निजी भक्त हैं ।
(क्रमशः)

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