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*सगुरा सत संयम रहै, सन्मुख सिरजनहार ।*
*निगुरा लोभी लालची, भूंचै विषय विकार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*कृपण का अंग १२०*
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पहु१ पहुमी२ अंतक३ अगनि, विघ्न चोर ठग लेत ।
सूम४ भण्डारी सप्त का, धणियो गिण गिण देत ॥५॥
कृपण४-राजा१; पृथ्वी२, यमराज३, अग्नि, विघ्न, चोर और ठग इन सात का भण्डारी है, इनको गिन गिन कर देता है और ये लेते हैं ।
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रज्जब सूम१ सनेही सप्त का, क्षिति२ क्षितिभुज३ यम चोर ।
जल ज्वाला४ बेली५ विघन, पग न पुण्य की ओर ॥६॥
कृपण१ व्यक्ति; पृथ्वी२, राजा३, यम, चोर, जल, अग्नि४ और विघ्न करने वाला मित्र५, इन सात का प्रेमी होता है, उसके पैर पुण्य की और नहीं उठते ।
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पहु१ पहुमी२ यम चोर को, कृपण कमावै आथि३ ।
रज्जब धुके४ न धर्म दिशि, जो संबल५ ह्वै साथि ॥७॥
कृपण-राजा१, पृथ्वी२, यम और चोर के लिये कमा कर धन जमा३ रखता है, कृपण धर्म की ओर तो झुकता४ नहीं, जिससे उसके साथ परलोक के मार्ग का खर्च५ हो ।
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सूम१ सदा संयम रहै, इन्द्रियों परसे२ नांहि ।
तन डिग तो धन से धका, मत कौडे३ कछु जाँहिं ॥८॥
कृपण१ सदा संयम से रहता है. इन्द्रियों से विषयों का स्पर्श२ नहीं करता, विषयों की ओर शरीर को डिगने से धन को धक्का लगता है, न कहीं कुछ दाम३ खर्च हो जाय, ऐसी शंका रहती है ।
(क्रमशः)

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