रविवार, 24 मई 2020

*१५०. छोटे हरिदास को स्‍त्री-दर्शन का दण्‍ड*


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू मन मृतक भया, इंद्री अपने हाथ ।*
*तो भी कदे न कीजिये, कनक कामिनी साथ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५०. छोटे हरिदास को स्‍त्री-दर्शन का दण्‍ड*
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सरलता के साथ भगवान जी ने कहा- 'प्रभो ! माधवी देवी के यहाँ से मंगाये हैं। 'सुनते ही महाप्रभु के भाव में एक प्रकार का विचित्र परिवर्तन-सा हो गया। उन्‍होंने गम्‍भीरता के साथ पूछा- 'माधवी के यहाँ से लेने कौन गया था? 'उसी प्रकार उन्‍होंने उत्तर दिया- 'प्रभो ! छोटे हरिदास गये थे।'
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यह सुनकर महाप्रभु चुप हो गये और मन-ही-मन कुछ सोचने लगे। पता नहीं वे हरिदास जी की किस बात से पहले से ही असन्‍तुष्‍ट थे। उनका नाम सुनते ही वे भिक्षा से उदासीन-से हो गये। फिर कुछ सोचकर उन्‍होंने भगवान के प्रसाद को प्रणाम किया और अनिच्‍छापूर्वक कुछ थोड़ा-बहुत प्रसाद पा लिया।
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आज वे प्रसाद पाते समय सदा की भाँति प्रसन्‍न नहीं दीखते थे, उनके हृदय में किसी गहन विषय पर द्वन्‍द्व-युद्ध हो रहा था। भिक्षा पाकर वे सीधे अपने स्‍थान पर आ गये। आते ही उन्‍होंने अपने निजी सेवक गोविन्‍द को बुलाया। हाथ जोड़े हुए गोविन्‍द प्रभु के सम्‍मुख उपस्थि‍त हुआ।
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उसे देखते ही प्रभु रोष के स्‍वर में कुछ दृढ़ता के साथ बोले- 'देखना, आज से छोटा हरिदास हमारे यहाँ कभी न आने पावेगा। यदि उसने भूल में हमारे दरवाजे में प्रवेश किया तो फिर हम बहुत अधिक असन्‍तुष्‍ट होंगे। मेरी इस बात का ध्‍यान रखना और दृढ़ता के साथ इसका पालन करना।'
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गोविन्‍द सुनते ही सन्‍न रह गया। वह प्रभु की इस आज्ञा का कुछ भी अर्थ न समझ सका। धीरे-धीरे वह प्रभु के पास से उठकर स्‍वरूपगोस्‍वामी के पास चला गया। उसने सभी वृतान्‍त उनसे कह सुनाया। सभी प्रभु की इस भीषण आज्ञा को सुनकर चकित हो गये। प्रभु तो ऐसी आज्ञा कभी नहीं देते थे।
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वे तो पतितों से भी प्रेम करते थे, आज यह बात क्‍या हुई। वे लोग दौड़े-दौड़े हरिदास के पास गये और उसे सब सुनाकर पूछने लगे- 'तुमने ऐसा कोई अपराध तो नहीं कर डाला जिससे प्रभु इतने क्रुद्ध हो गये? 'इस बाते के सुनते ही छोटे हरिदास का मुख सफेद पड़ गया। उसके होश-हवास उड़ गये। अत्‍यन्‍त ही दु:ख और पश्‍चात्ताप के स्‍वर में उसने कहा- 'और तो मैंने कोई अपराध किया नहीं, हाँ, भगवानाचार्य के कहने से माधवी दासी के घर से मैं थोड़े-से चावलों की भिक्षा अवश्‍य माँग लाया था।'
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सभी भक्त समझ गये कि इस बात के अंदर अवश्‍य ही कोई गुप्‍त रहस्‍य है। प्रभु इसी के द्वारा भक्‍तों को त्‍याग-वैराग्‍य की कठोरता समझाना चाहते हैं। सभी मिलकर प्रभु के पास गये और प्रभु के पैर पकड़कर प्रार्थना करने लगे- 'प्रभो ! हरिदास अपने अपराध के लिये हृदय से अत्‍यन्‍त ही दु:खी हैं। उन्‍हें क्षमा मिलनी चाहिये। भविष्‍य में उनसे ऐसी भूल कभी न होगी। उन्‍हें दर्शनों से वंचित न रखिये।'
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प्रभु ने उसी प्रकार कठोरता के स्‍वर में कहा- 'तुम लोग अब इस सम्‍बन्‍ध में मुझसे कुछ भी न कहो। मैं ऐसे आदमी का मुख देखना नहीं चाहता जो वैरागी वेष बनाकर स्त्रियों से सम्‍भाषण करता है।' अत्‍यन्‍त ही दीनता के साथ स्‍वरूपगोस्‍वामी ने कहा- 'प्रभो ! उनसे भूल हो गयी, फिर माधवी देवी तो परम साध्‍वी भगवदभक्ति परायणा देवी हैं, उनके दर्शनों के अपराध के ऊपर इतना कठोर दण्‍ड न देना चाहिये।'
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प्रभु ने दृढ़ता के साथ कहा- 'चाहे कोई भी क्‍यों न हो ! स्त्रियों से बात करने की आदत पड़ना ही विरक्‍त साधु के लिये ठीक नहीं। शास्‍त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि अपनी सगी माता, बहिन और युवती लड़की से भी एकान्‍त में बातें न करनी चाहिये। ये इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि अच्‍छे-अच्‍छे विद्वानों का मन भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।'
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प्रभु का ऐसा दृढ़ निश्‍चय देखकर और उनके स्‍वर में दृढ़ता देखकर फिर किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हुआ। हरिदास जी ने जब सुना कि प्रभु किसी भी तरह क्षमा करने के लिये राजी नहीं हैं, तब तो उन्‍होंने अन्‍न-जल बिलकुल छोड़ दिया। उन्‍हें तीन दिन बिना अन्‍न-जल के हो गये, किन्‍तु प्रभु अपने निश्‍चय से तिलभर भी न डिगे।
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तब तो स्‍वरूपगोस्‍वामी जी को बड़ी चिन्‍ता हुई। प्रभु के पास रहने वाले सभी विरक्‍त भक्‍त डरने लगे। उन्‍होंने नेत्रों से तो क्‍या मन से भी स्त्रियों का चिन्‍तन करना त्‍याग दिया। कुछ विरक्‍त स्त्रियों से भिक्षा ले आते थे, उन्‍होंने उनसे भिक्षा लाना ही बन्‍द कर दिया। स्‍वरूप गोस्‍वामी डरते-डरते एकान्‍त में प्रभु के पास गये।
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उस समय प्रभु स्‍वस्‍थ होकर कुछ सोच रहे थे। स्‍वरूप जी प्रणाम करके बैठ गये। प्रभु प्रसन्‍नता पूर्वक उनसे बातें करने लगे। प्रभु को प्रसन्‍न देखकर धीरे-धीरे स्‍वरूपगोस्‍वामी कहने लगे- 'प्रभो ! छोटे हरिदास ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। उसके ऊपर इतनी अप्रसन्‍नता क्‍यों? उसे अपने किये का बहुत दण्‍ड मिल गया, अब तो उसे क्षमा मिलनी चाहिये।'
(क्रमशः)

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