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*मुझ भावै सो मैं किया, तुझ भावै सो नांहि ।*
*दादू गुनहगार है, मैं देख्या मन मांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५०. छोटे हरिदास को स्त्री-दर्शन का दण्ड*
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प्रभु ने अत्यन्त ही स्नेह के साथ विवशता के स्वर में कहा- 'स्वरूप जी ! मैं क्या करूं? मैं स्वयं अपने को समझाने में असमर्थ हूँ। जो पुरुष साधु होकर प्रकृति संसर्ग रखता है और उनसे सम्भाषण करता है, मैं उससे बातें नहीं करना चाहता। देखो, मैं तुम्हें एक अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण बात बताता हूँ इसे ध्यानपूर्वक सुनो और सुनकर हृदय में धारण करो, वह यह है -
श्रृणु हृदयरहस्यं यत्प्रशस्तं मुनीनां
न खलु न खलु योषित्सन्निधि: संनिधेय:।
हरति हि हरिणाक्षी क्षिप्रमक्षिक्षुरप्रै:
पिहितशमतनुत्रं चित्तमप्युत्तमानाम्॥[१]
(सु. र. भां. ३६५/७२)
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मैं तुमसे हृदय के रहस्य को बतलाता हूँ जिसकी ऋषि-मुनियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, उसे सुनो; (विरक्त पुरुषों को) स्त्रियों की सन्निधि में नहीं रहना चाहिये, नहीं रहना चाहिये, क्योंकि हरिणी के समान सुन्दर नेत्रों वाली कामिनी अपने तीक्ष्ण कटाक्ष-बाणों से बड़े-बड़े महापुरुषों के चित्त को भी, जो शान्ति के कवच से ढँका हुआ है, शीघ्र ही अपनी ओर खींच लेती है।
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इसलिये भैया ! मेरे जाने, वह भूखों मर ही क्यों न जाय अब मैं जो निश्चय कर चुका उससे हटूँगा नहीं। 'स्वरूप जी उदास मन से लौट गये। उन्होंने सोचा- 'प्रभु परमानन्दपुरी महाराज का बहुत आदर करते हैं, यदि पुरी उनसे आग्रह करें तो सम्भवतया वे मान भी जाये। 'यह सोचकर वे पुरी महाराज के पास गये।
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सभी भक्तों के आग्रह करने पर पुरी महाराज प्रभु से जाकर कहने के लिये राजी हो गये। वे अपनी कुटिया में से निकलकर प्रभु के शयन स्थान में गये। पुरी को अपने यहाँ आते देखकर प्रभु उठकर खड़े हो गये और उनकी यथा विधि अभ्यर्चना करके उन्हें बैठने के लिये आसन दिया।
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बातों-ही-बातों में पुरी जी ने हरिदास का प्रसंग छेड़ दिया और कहने लगे- 'प्रभो ! इन अल्प शक्ति वाले जीवों के साथ ऐसी कड़ाई ठीक नहीं है। बस, बहुत हो गया, अब सबको पता चल गया, अब कोई भूल से भी ऐसा व्यवहार न करेगा। अब आप उसे क्षमा कर दीजिये और अपने पास बुलाकर उसे अन्न-जल ग्रहण करने की आज्ञा दे दीजिये।'
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पता नहीं प्रभु ने उसका और भी पहले कोई ऐसा निन्द्य आचरण देखा था या उसके बहाने सभी भक्तों को घोर वैराग्य की शिक्षा देना चाहते थे। हमारी समझ में आ ही क्या सकता है ! महाप्रभु पुरी के कहने पर भी राजी नहीं हुए। उन्होंने उसी प्रकार दृढ़ता के स्वर में कहा- 'भगवान ! आप मेरे पूज्य हैं, आपकी उचित-अनुचित सभी प्रकार की आज्ञाओं का पालन करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ, किन्तु न जाने क्यों, इस बात को मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। आप इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहें।'
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पुरी महाराज ने अपने वृद्धपने के सरल भाव से अपना अधिकार-सा दिखाते हुए कहा- 'प्रभो ! ऐसा हठ ठीक नहीं होता, जो हो गया सो हो गया उसके लिये इतनी ग्लानि का क्या काम? सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं।'
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प्रभु ने कुछ उत्तेजना के साथ निश्चयात्मक स्वर में कहा- 'श्रीपाद ! इसे मैं भी जानता हूँ कि सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं। फिर मैं ही ही इससे कैसे बच सकता हूँ। मैं भी तो ऐसा करने के लिये मजबूर ही हूँ। इसका एक ही उपाय है, आप यहाँ सभी भक्तों को साथ लेकर रहें, मैं अकेला अलालनाथ में जाकर रहूँगा। बस, ऊपर के कामों के निमित्त गोविन्द मेरे साथ वहाँ रहेगा।'
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यह कहकर प्रभु ने गोविन्द को जोरों से आवाज दी और आप अपनी चद्दर को उठाकर अलालनाथ की ओर चलने लगे। जल्दी से उठकर पुरी महाराज ने प्रभु को पकड़ा और कहने लगे- 'आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी माया जानी नहीं जाती। पता नहीं क्या कराना चाहते हैं। अच्छी बात है, जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये। मेरा ही यहाँ क्या रखा है? केवल आपके ही कारण मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ। आपके बिना मैं यहाँ रहने ही क्यों लगा? यदि आपने ऐसा निश्चय कर लिया है तो ठीक है। अब मैं इस सम्बन्ध में कभी कुछ न कहूँगा।'
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यह कहकर पुरी महाराज अपनी कुटिया में चले गये, प्रभु फिर वहीं लेट गये।
जब स्वरूपगोस्वामी ने समझ लिया कि प्रभु अब किसी की भी न सुनेंगे तो वे जगदानन्द, भगवानाचार्य, गदाधर गोस्वामी आदि दस-पांच भक्तों के साथ छोटे हरिदास के पास गये और उसे समझाने लगे- 'उपवास करके प्राण गँवाने से क्या लाभ? जीओगे तो भगवन्नाम-जाप करोगे, स्थान पर जाकर न सही, जब प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शनों को जाया करें तब दूरसे दर्शन कर लिया करो। उनके होकर उनके दरबार में पड़े रहोगे तो कभी-न-कभी वे प्रसन्न हो ही जायँगे।'
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कीर्तनिया हरिदास जी की समझ में यह बात आ गयी, उसने भक्तों के आग्रह से अन्न-जल ग्रहण कर लिया। वह नित्यप्रति दर्शनों को मन्दिर जाते समय दूर से दर्शन कर लेता और अपने को अभागा समझता हुआ कैदी की तरह जीवन बिताने लगा। उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, किसी से मिलने की इच्छा नहीं होती थी, गाना-बजाना उसने एकदम छोड़ दिया।
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सदा वह अपने असद व्यवहार के विषय में ही सोचता रहता। होते-होते उसे संसार से एकदम वैराग्य हो गया। ऐसा प्रभुकृपाशून्य जीवन बीताना उसे भार-सा प्रतीत होने लगा। अब उसे भक्तों के सामने मुख दिखाने में भी लज्जा होने लगी। इसलिये उसने इस जीवन का अन्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
(क्रमशः)

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