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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*सो दारू किस काम की, जाथैं दर्द न जाइ ।*
*दादू काटै रोग को, सो दारू ले लाइ ॥५२॥*
जन्म-मरण रूपी रोग अविद्या निवृतक ब्रह्म ज्ञान से ही दूर हो सकता है अतः जिज्ञासु को ब्रह्म ज्ञान का अनुभव करना चाहिये ।
विवेकचूड़ामणि में- अन्तःकरण अनन्त वासना रूपी धूलि से भरा पड़ा है, जिन वासनाओं का नाश बड़ा ही कठिन है । इस वासनारूपी धूलि ने परमात्मज्ञान की जो जिज्ञासा है उसको आच्छादित कर रखा है । जब साधक विवेक विज्ञान के द्वारा वासना धूलि को हटाने का संघर्ष करेगा तब जैसे चन्दन को घिसने से सुगंधी अपने आप प्रगट हो जाती है वैसा ही परमात्मा भी प्रगट हो जाता है ।
अनात्म पदार्थों की वासना जाल से परमात्मवासना तिरोभूत हो रही है । अतः जब साधक अनात्मवासनाओं को नष्ट करके आत्मनिष्ठ हो जायगा तब आत्मा स्वयं ही प्रकाशित हो जायगा ।
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*दादू अनुभव काटै रोग को, अनहद उपजै आइ ।*
*सेझे का जल निर्मला, पीवै रुचि ल्यौ लाइ ॥५३॥*
*सोई अनुभव सोई ऊपजी, सोई शब्द तत सार ।*
*सुनतां ही साहिब मिलै, मन के जाहिं विकार ॥५४॥*
*॥ चानक उपदेश ॥*
*औषध खाइ न पथ्य रहै, विषम व्याधि क्यों जाइ ।*
*दादू रोगी बावरा, दोष बैद को लाइ ॥५५॥*
*एक सेर का ठांवड़ा, क्योंही भर्या न जाइ ।*
*भूख न भागी जीव की, दादू केता खाइ ॥५६॥*
मनुष्यों का पेट तो सेर भर अन्न समा जाये, इतना ही बड़ा है और उसको तो जैसे तैसे उपाय से भर सकते हैं । परन्तु मन की जो वासना है उसकी पूर्ति तो ब्रह्मा की आयु, पर्यन्त भरने की कौशिश करें तब भी नहीं भर सकते क्योंकि भोगों से वासना निवृत्त नहीं होती है प्रत्युत दिन रात बढ़ती है । अतः साधक को चाहिये कि भोजन आच्छादन में संतोष करे ।
महाभारत में- जैसे अग्नि में घृत की आहुति डालने पर अधिक बढ़ती है ऐसे ही कामनाओं को भोगने से कामना निवृत्त न होकर बढ़ती ही जाती है ।
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*पशुवां की नांई भर भर खाइ, व्याधि घणेरी बधती जाइ ।*
*पशुवां नांई करै अहार, दादू बाढै रोग अपार ।*
*राम रसायन भर भर पीवै, दादू जोगी जुग जुग जीवै ॥५७॥*
पशु की तरह अन्न खाने वाला नाना व्याधियों से ग्रस्त रहता है और सिंह आदि पशुओं की तरह मांस भक्षक भी रोगों से पीड़ित रहता है । अतः साधक को युक्तियुक्त भोजन करना चाहिये । लेकिन राम रसायन का तो यथेच्छ पान करो क्योंकि वह तो सब रोगों का नाशक है और उसको पीने वाला अमर बन जाता है । आयुर्वेद में लिखा है कि- आधे पेट को भोजन से पूरा करो तृतीय भाग को पानी से भर लो । तथा पेट के चोथे भाग में वायु को घूमने के लिये खाली रखो ।
गीता में- ज्यादा भोजन करने से योगाभ्यास नहीं होता । क्योंकि अधिक भोजन करने से नशा आता है, आलस्य पैदा होता है । सर्वथा भोजन न करने से भी योग साधना नहीं बनेगी । क्योंकि शरीर कमजोर हो जायगा । अतः ज्यादा खाना बिलकुल न खाना ज्यादा सोना, जागना, सर्वथा न सोना यह योग के बाधक है । अतः योगी को आहार, विहार युक्त होना चाहिये और अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुए योग करना चाहिये । सोना जागना भी परिमित ही होना चाहिये । ऐसा योग दुःख को मिटाता है ।
(क्रमशः)

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