सोमवार, 1 जून 2020

*पंचवटी में कीर्तनानन्द*

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*क्या मुँह ले हँस बोलिये, दादू दीजे रोइ ।* 
*जन्म अमोलक आपना, चले अकारथ खोइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
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(७)
*पंचवटी में कीर्तनानन्द* 
दिन के तीसरे पहर भक्तगण पंचवटी में कीर्तन कर रहे हैं । 
श्रीरामकृष्ण भी उनमें मिल गये; भक्तों के साथ मातृनामसंकीर्तन करते हुए आनन्द में मग्न हो रहे हैं ।
(गीत का भावार्थ)- ‘श्यामा माँ के चरणरूपी आकाश में मन की पतंग उड़ रही थी । कलुष की वायु से वह चक्कर खाकर गिर पड़ी । माया का कन्ना भारी हुआ, मैं फिर उसे उठा नहीं सका । स्त्री-पुत्रादि के तागे में उलझकर वह फट गयी । उसका ज्ञानरूपी मस्तक(ऊपर का हिस्सा) अलग हो गया है । उठाने से ही वह गिर पड़ती है । जब सिर ही नहीं रह गया तो वह उड़ कैसे सकती है । साथ के छः आदमियों की(कामक्रोधादि की) विजय हुई । वह भक्ति के तागे से बँधी थी । खेलने के लिए आते ही तो यह भ्रम सवार हो गया । ‘नरेशचन्द्र’ को इस हँसने और रोने से तो बेहतर आना ही न था ।”
फिर गाना होने लगा । गीत के साथ ही मृदंग-करताल बजने लगे । श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ नाच रहे हैं ।
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(गीत का भावार्थ)-‘मेरा मन-मधुप श्यामापद-नीलकमल में मस्त हो गया । कामादि पुष्पों में जितने विषय-मधु थे, सब तुच्छ हो गए । चरण काले हैं, मधुप काला है, काले से काला मिल गया । पंचतत्त्व यह तमाशा देखकर भाग गए । ‘कमलाकान्त’ के मन की आशा इतने दिनों में पूर्ण हुई । सुख-दुःख दोनों बराबर हुए, केवल आनन्द का सागर उमड़ रहा है ।’ कीर्तन हो रहा है, और भक्त गा रहे हैं ।
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(भावार्थ)-“श्यामा माँ ने एक कल बनायी है । साढ़े-तीन हाथ की कल के भीतर वह कितने ही रंग दिखा रही है । वही स्वयं कल के भीतर रहकर कल की डोर पकड़कर उसे घुमाया करती है । कल कहती है, मैं खुद घूमती हूँ । वह यह नहीं जानती कि कौन उसे घुमा रहा है । जिसने कल को पहचान लिया है, उसे कल न होने होगा । किसी किसी कल की भक्तिरूपी डोर में श्यामा माँ स्वयं बँधी हुई है ।” 
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भक्त लोग आनन्द करने लगे । जब उन्होंने थोड़ी देर के लिए गाना बन्द किया तब श्रीरामकृष्ण उठे । इधर उधर अभी अनेक भक्त हैं । श्रीरामकृष्ण पंचवटी से अपने कमरे की ओर जा रहे हैं । मास्टर साथ हैं । बकुल के पेड़ के नीचे जब वे आये तब त्रैलोक्य से भेंट हुई । उन्होंने प्रणाम किया ।
श्रीरामकृष्ण(त्रैलोक्य से)- पंचवटी में वे लोग गा रहे हैं, एक बार चलकर देखो ।
त्रैलोक्य- मैं जाकर क्या करूँ ?
श्रीरामकृष्ण- क्यों, देखने का आनन्द मिलता ।
त्रैलोक्य- एक बार देख आया ।
श्रीरामकृष्ण- अच्छा, ठीक है ।
(क्रमशः)

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