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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १३. साच का अंग)
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*॥ साच ॥*
*दादू अपना नीका राखिये, मैं मेरा दिया बहाइ ।*
*तुझ अपने सेती काज है, मैं मेरा भावै तीधर जाइ ॥६२॥*
किसी ने प्रश्न किया कि क्या आप त्यक्तधर्मा हैं क्योंकि हम आपको किसी भी धर्म का पालन करते नहीं देखते हैं दादू जी ने उत्तर दे रहे हैं कि-
हे वादिन् ! यदि मैं किसी भी धर्म को नहीं मानता हूं तो आप की इसमें क्या हानि हो रही है । मेरे धर्म मेरे साथ तुम्हारा धर्म तुम्हारे साथ है । अतः आप यहां से पधारो और अपने धर्म का पालन करो । क्योंकि धर्म जब ही रक्षा करता है जब कि मानव धर्म का पालन करता हुआ धर्म की रक्षा करता हो ।
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*जे हम जाण्या एक कर, तो काहे लोक रिसाइ ।*
*मेरा था सो मैं लिया, लोगों का क्या जाइ ॥६३॥*
यदि ब्रह्म ज्ञान होने से मेरी अद्वैत ब्रह्म में निष्ठा है तो ये द्वैतवादी कर्मकाण्डी लोग मेरे से क्यों विद्वेष करते हैं कि तुम कर्मकाण्ड क्यों नहीं करते हो? मैं तो अपने आत्मस्वरूप को प्राप्त हो गया हूँ । आप लोगों का मैंने कुछ छीना भी नहीं जिससे तुम लड़ते हो । आप लोग मेरी निष्ठा को देख कर व्यर्थ ही दुःखी हो रहे हो । मैं तो ब्रह्म विद्या का जो फल है स्वात्मानन्द उससे सदा संतुष्ट रहता हूं । वेदान्तसंदर्भ में यही कहा है कि जीवनमुक्त पुरुष ब्रह्मविद्या का जो फल आत्मानन्द है उससे सदा संतुष्ट रहता है । उसको कर्मकाण्ड से क्यों लेना देना है?
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*॥ करणी बिना कथनी ॥*
*दादू द्वै द्वै पद किये, साखी भी द्वै चार ।*
*हमको अनुभव ऊपजी, हम ज्ञानी संसार ॥६४॥*
*सुन सुन पर्चे ज्ञान के, साखी शब्दी होइ ।*
*तब ही आपा ऊपजै, हम-सा और न कोइ ॥६५॥*
दो तीन वाक्यों की रचना से अथवा किसी काव्य आदि की रचना करने से कितने ही लोग अपने को ज्ञानी मानने लगते हैं । परन्तु श्लोक रचना या काव्य रचना से आत्मा का अनुभव नहीं हो सकता । ऐसे ही ज्ञान की कथा श्रवण मात्र से भी किसी को ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता किन्तु हम ज्ञानी पंडित हैं यह अभिमान ही बढ़ता है जो ज्ञान का प्रतिबन्धक माना जाता है । अतः साधक को चाहिये कि व्यर्थ के वादविवाद से अपने समय को नष्ट न करें ।
वेदान्तसंदर्भ में- कुछ ज्ञान को विघ्न बतलाते हैं कि-निरन्तर आत्मा का अनुसंधान न करना । आलस्य, भोग लालसा, भय, तमोगुण, विक्षेप तेज का स्पन्दन आदि बहुत से विघ्न हैं, उनको त्याग कर प्रमाद रहित जितेन्द्रिय होकर समाधिनिष्ठ रहे तो ब्रह्म का अनुभव होता है ।
(क्रमशः)

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