बुधवार, 3 जून 2020

*५. परचा कौ अंग ~ १/४*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ १/४*
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सामगरी१ अब तेज की, कोई बरतै२ बिरला संत ।
जगजीवन तहां एक रस, कंवल खुल्या मिलि कंत३ ॥१॥
{१. सामगरी-सामग्री(=साधन) समस्त उपकरण} 
(२. बरतै-उपयोग में लावे)   (३. कंवल खुल्या मिलि कंत-परमपति परमेश्वर से मिलकर हृदय बहुत प्रसन्न हुआ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार में जितना भी कुछ व्याप्त है वह प्रभु प्रभा का ही है। जिसका उपयोग कोइ संत ही करता है, जब हृदय कमल प्रभु प्रेम से विकसित होता है तो परमेश्वर मिलते हैँ।
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तेज सम्रपन कीजिये, तेज ही भोग लगाइ ।
कहि जगजीवनदास तहां, तेज हि भावै ताहि ॥२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं अपने जीवन में परमात्मा की प्रभा का ही श्रेष्ठ होना स्वीकार करें, उसका ही उपयोग करें जहाँ परमात्मा का तेज होता है वह ही परमात्मा को प्रिय होता है।
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तेज४ हि खाणां पीवणां, तेज हि भोग बिलास ।
तेज हि बरतनि साधु का, सो कहि जगजीवनदास४ ॥३॥
(४-४. साधु का खाना, पीना, सोना, जागना आदि समस्त लौकिक व्यवहार उस तेजः पुञ्जमय परमपिता परमात्मा को ही समर्पित रहता है॥२-३॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संतजन का खाना पीना सोना जागना  समस्त लौकिक व्यवहार प्रभु समर्पित होता है और उस परमात्मा के तेज में रहना ही संतजन श्रेष्ठ कहते हैं।
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जा की देही तेज की, सोई तेज का तेज५ ।
जगजीवन वो तहां बिराजै, तेज तेज की सेज ॥४॥ 
(५. तेज का तेज-सबसे उत्तम प्रकाश)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो देह उस परमात्मा के तेज को समर्पित है वह ही उस तेजोमय प्रभु की पसंद है । इस प्रकार प्रभु अपने अनुग्रह में रहने वाले जन के साथ विराजते हैं। सुन्दर समन्वय है जीव प्रभु के तेज में और तेजोमय प्रभु अनुग्रहित जीव के संग।
(क्रमशः)

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