शुक्रवार, 5 जून 2020

= *साँच चाणक का अंग १२१(१/४)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू सब दिखलावैं आपको, नाना भेष बनाइ ।*
*जहँ आपा मेटन, हरि भजन,*
*तिहिं दिशि कोइ न जाइ ॥ *
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*साँच चाणक का अंग १२१*
इस अंग में सत्य और चुभने वाले विचार प्रकट कर रहे हैं ~
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शब्द सलूजे बहुत हैं, तन मन सुलझ्या एक ।
रज्जब जीव जंजाल में, जिह्वा बहुत विवेक ॥१॥
शब्दों के सुलझे हुये अर्थात कथन मात्र के ज्ञानी तो बहुत हैं किन्तु जिसका तन, मन माया जाल से निकल गया हो ऐसा कोई एक ही हो सकता है । वैसे ही जीव यम जाल में पड़ा है किन्तु वाणी में बहुत ज्ञान रखता है ।
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मुख मुक्ते मन में बँधे, ऐसे कपटी कोड़ि ।
रज्जब विरक्त बक्त्र१ सौं, रहे विषय वपु जोड़ि२ ॥२॥
मुख के शब्दों से मुक्त और मन के विषयासक्ति से बंधे हुये ऐसे कपटी ज्ञानी कोटिन हैं, वे मुख१ से तो अपने को विरक्त बताते हैं किन्तु शरीर विषयों के साथ ही लगाया२ रखते हैं ।
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ब्रह्माण्ड पिंड माँहिं बँधे, छाजन१ भोजन बंध ।
रज्जब मन मनसा२ जड़े३, मुहड़ै४ कहै अबंध५ ॥३॥
ब्रह्माण्ड के विषयों की आसक्ति से बंधे हुये हैं, शरीर के उपकारक भोजन, वस्त्रादि१ में बंधे हुये हैं मन बुद्धि२ भूषण में नगों के समान माया से जटित३ है । और मुख४ से अपने को बंधन रहित मुक्त५ कहते हैं ।
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बात हु मुक्ते गात१ बंध, मुहकम२ माया माँहिं ।
सफरी३ सूवा४ जाल पिंजरे, शिर निकसै धड़ निकसै नाँहिं ॥४॥
मच्छी३ जाल में और शुक४ पक्षी पिंजरे में हैं, उसका शिर तो जाल तथा पिंजरे से निकल सकता है किन्तु धड़ तो नहीं निकलते वैसे ही बातों से तो मुक्त हो जाते हैं किन्तु शरीर१ की आसक्ति में तथा माया में दृढता२ से बंधे रहते हैं ।
(क्रमशः)

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