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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ १३/१६*
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कामिनि तहां क्रीळा करै, मनसा मेरी जाइ ।
जगजीवन पिव परसतां, आनंद अंगन माइ ॥१३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ आत्मा, सुंदरी आनंदित हो जहाँ तक मेरी कामनाओं की पहुंच हो वहां प्रभु पिया से जब मेल होता है तो अवर्णनीय सुख का अनुभव होता है।
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झिलमिलाट३ उस जोति का, तेज न बरण्या जाइ ।
कहि जगजीवन तहँ संत सब, थकित भये लिव लाइ३ ॥१४॥
{३-३. ऐसे तेज की चमक का वर्णन नहीं किया जा सकता । उसी तेज का आलम्बन लेकर सन्त(सच्चा साधक) स्थितप्रज्ञ अवस्था में पहुँच जाता है ॥१४॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा की उस ज्योति का वर्णन नहीं किया जा सकता वहां आनंद अतिरेक से सभी संत स्थितप्रज्ञ अवस्था में पहुंच जाते हैं।
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तपै तेज तिहुँ लोक मैं, पसरै किरण अनंत ।
प्रगट देखै रांम कूं, जगजीवन ते संत ॥१५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा का प्रकाश तीन लोक में फैला है और अनंत किरणें प्रकिरत हो रही है वहीं पर संत ईश्वर को देखते हैं और जिन्हें ये सब दिखता है वे ही सच्चे संत है।
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जगजीवन अंग नूर का, तपै निरंतर तेज ।
अंतर खेलै आतमा, पारब्रह्म की सेज ॥१६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा का जो अंग है वहां निरंतर तजोमय प्रभाव रहता है। वहां अतंर में भी आत्मा परम ब्रह्म के साथ आंनदित होती है।
(क्रमशः)

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