मंगलवार, 2 जून 2020

*१५४. पुरीदास या कवि कर्णपूर*

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*दादू साचा साहिब शिर ऊपरै, ताती न लागै बाव ।*
*चरण कमल की छाया रहै, किया बहुत पसाव ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५४. पुरीदास या कवि कर्णपूर*
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जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धा: कवीश्वरा:।
नास्ति तेषां यश:काये जरामरणजं भयम्॥[१]
(उन परमपुण्यवान रससिद्ध कवीश्वरों की जय हो, जिनके यशरूपी शरीर को अवश्य प्राप्त होने वाले बुढ़ापे तथा मरण का भय नहीं है। अर्थात कवियों का यथार्थ शरीर उनका सुयश ही है। उनका सुयश सदा अमर बना रहता है। उसका नाश कभी नहीं होता। भर्तृहरि. नीति. २४)
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कविता एक भगवद्दत्त वस्तु है। जिसके हृदय में कमनीय कविता करने की कला विद्यमान है उसके लिये फिर राज्य सुख की क्या अपेक्षा। इन्द्रासन उसके लिये तुच्छ है। कविता गणित की तरह अभ्यास करने से नहीं आती, वह तो अलौकिक प्रतिभा है, किसी भाग्यवान पुरुष को ही पूर्वजन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त हो सकती है।
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कवि क्या नहीं कर सकता? जिसे चाहे अमर बना सकता है। जिसे चाहे पाताल पहुँचा सकता है। भोज, विक्रम जैसे अरबों-खरबों नहीं असंख्यों राजा हो गये, उनका कोई नाम क्यों नहीं जानता-इसलिये कि वे कालिदास जैसे कवि कुलचूडामणि महापुरुष के श्रद्धाभाजन नहीं बन सके।
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थोड़ी देर के लिये भगवान राम-कृष्ण के अवतार की बात को छोड़़ दीजिये। सामान्य दृष्टि से वह केवल अपने प्रचण्ड दोर्दण्डबल के कारण नहीं बन सके। वाल्मीकि और व्यास ने उन्हें बली और वीर बनाया। तभी तो मैं कहता हूँ, कवि ईश्वर है, अचतुर्भुज विष्णु है, एक मुख वाला ब्रह्मा है और दो नेत्रों वाला शिव है।
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कवि वन्द्य है, पूज्य है, आदरणीय और सम्माननीय है। कवि के चरणों की वन्दना करना ईश्वर की वन्दना के समान है। कविता रूप से श्रीहरि ही उसके मुख से भाषण करते हैं, जिसे सुनकर सुकृति और भाग्यवान पुरुषों का मन मयूर पंख फैलाकर नृत्य करने लगता है और नृत्य करते-करते अश्रुविमोचन करता है।
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उन अश्रुओं को बुद्धिरूपी मयूरी पान करती है और उन्हीं अश्रुओं से आह्लादरूपी गर्भ को धारण करती है, जिससे आनन्दरूपी पुत्र की उत्पत्ति होती है। वे पिता धन्य हैं जिनके घर में प्रतिभाशाली कवि उत्पन्न होते हैं।
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ऐसा सौभाग्य श्री शिवानन्द सेन-जैसे सुकृति, साधुसेवी और भगवद्भक्त पुरुषों को ही प्राप्त हो सकता है, जिनके कवि कर्णपूर-जैसे नैसर्गिक प्रतिभा सम्पन्न कवि पुत्र उत्पन्न हुए कविता का कोई निश्चय नहीं, वह कब परिस्फुट हो उठे। किसी किसी में तो जन्म से ही वह शक्ति विद्यमान रहती है, जहाँ वे बोलने लगते हैं वहीं उनकी प्रतिभा फूटने लगती है। कवि कर्णपूर ऐसे ही स्वाभाविक कवि थे।
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महाप्रभु जब संन्यास ग्रहण करके पुरी में विराजमान थे, तब बहुत से भक्तों की स्त्रियाँ भी अपने पतियों के साथ प्रभु दर्शनों की लालसा से पुरी जाया करती थीं। एक बार जब शिवानन्द सेन जी अपनी पत्नी के साथ भक्तों को लेकर पुरी पधारे तब श्रीमती सेन गर्भवती थीं।
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प्रभु ने आज्ञा दी कि अबके जो पुत्र हो, उसका नाम पुरी गोस्वामी के नाम पर रखना। प्रभु भक्त सेन महाशय ने ऐसा ही किया, जब उनके पुत्र हुआ तो उसका नाम रखा परमानन्ददास। परमानन्ददास जब बड़े हुए तब वे प्रभु दर्शनोें के लिये अपनी उत्कण्ठा प्रकट करने लगे।
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इनकी प्रभु परायण माता ने बाल्यकाल से ही इन्हेें गौर-चरित्र रटा दिये थे और सभी गौर भक्तों के नाम कण्ठस्थ करा दिये थे। इनके पिता प्रतिवर्ष हजारों रुपये अपने पास से खर्च करके भक्तों को पुरी ले जाया करते थे और मार्ग में उनकी सभी प्रकार की व्यवस्था स्वयं करते थे। इनका घर भर श्रीचैतन्य चरणों का सेवक था।
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इनके तीन पुत्र थे-बड़े चैतन्यदास, मँझले रामदास और सबसे छोटे थे, परमानन्ददास, पुरीदास या कर्णपूर । परमानन्ददास बालकपन से ही होनहार, मेधावी, प्रत्युत्पन्नमति और सरस हृदय के थे। इनके बहुत आग्रह पर वे इन्हें इनकी माता के सहित प्रभु के पास ले गये। वैसे तो प्रभु ने इन्हें देख लिया था, किन्तु सेन इन्हें एकान्त में प्रभु के पैरों में डालना चाहते थे।
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एक दिन जब महाप्रभु स्वरूप गोस्वामी आदि दो-चार अन्तरंग भक्तों के सहित एकान्त में बैठे श्रीकृष्ण कथा कह रहे थे तभी सेन महाशय अपने पुत्र परमानन्दपुरी को प्रभु के पास लेकर पहुँच गये। सेन ने इन्हें प्रभु के पैरों में लिटा दिया, ये प्रभु के पैरों में लेटे ही लेटे उनके अँगूठे को चूसने लगे, मानो वे प्रभुपादपद्मों की मधुरिमा को पी रहे हों।
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प्रभु इन्हें देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा- ‘इसका नाम क्या रखा है?’ धीरे से महाशय ने कहा- ‘परमानन्ददास !’ प्रभु ने कहा- यह तो बड़ा लम्बा नाम हो गया, किसी से भी बड़ी कठिनता से लिया जायेगा। इसलिये पुरीदास ठीक है। यह कहकर वे बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए प्रेम से कहने लगे- ‘क्यों रे पुरीदास ! ठीक है न तेरा नाम? तू पुरीदास ही है न? बस, उस दिन से ये परमानन्ददास की जगह पुरीदास हो गये।’
(क्रमशः)

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