मंगलवार, 2 जून 2020

*१५४. पुरीदास या कवि कर्णपूर*

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*शब्द विचारै करणी करै, राम नाम निज हिरदै धरै ।*
*काया मांहीं शोधै सार, दादू कहै लहै सो पार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१५४. पुरीदास या कवि कर्णपूर*
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एक बार सेन इन्हें फिर लेकर प्रभु के दर्शनों को आये। तब प्रभु ने इन्हें पुचकारकर कहा- ‘बेटा पूरीदास ! अच्छा, कृष्ण-कृष्ण कहो।’ किन्तु पुरीदास ने कुछ नहीं कहा। तब तो प्रभु बहुत आश्चर्य में पड़ गये। पिता भी कह कहकर हार गये। प्रभु ने भी पुचकार, पुचकारकर कई बार कहा, किन्तु इन्होंने कृष्ण-कृष्ण नहीं कहा।
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तब तो पिता को इस बात से बड़ा दुःख हुआ कि हमारा यह पुत्र अभक्त होगा क्या, अभक्त पुत्र से तो बिना पुत्र के ही रहना अच्छा। प्रभु भी आश्चर्य करने लगे कि हमने जगत से श्रीकृष्ण नाम लिवाया, इस छोटे से बालक से श्रीकृष्ण नहीं कहला सके।
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इस पर स्वरूप गोस्वामी ने कहा- ‘यह बालक बड़ा ही बुद्धिमान है, इसने समझा है कि प्रभु ने हमें मन्त्र प्रदान किया है। इसलिये अपने इष्ट मन्त्र को मन ही मन जप रहा है। मन्त्र किसी के सामने प्रकट थोड़े ही किया जाता है।’ इस बात से सभी को सन्तोष हुआ।

एक दिन जब इसकी अवस्था केवल सात वर्ष की थी तब सेन महाशय इन्हें प्रभु के समीप ले गये। प्रभु ने पूछा- ‘कुछ पढ़ता भी है यह?’
सेन ने धीरे से कहा- ‘अभी क्या पढ़ने लायक है, ऐसे ही थोड़ा-बहुत खेल करता रहता है।’
प्रभु ने कहा- ‘पुरीदास ! अच्छा बेटा ! कुछ सुनाओ तो सही।’ इतना सुनते ही सात वर्ष का बालक स्वयं ही इस स्वरचित श्लोक को बोलने लगा-
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श्रवसोः कुवलयमक्ष्णारंजनमुरसो महेन्द्रमणिदाम।
वृन्दावनरमणीनां मण्डलनमखिलं हरिर्जयति॥[१]
([१] जो वृन्दावन की रमणियों के कानों के नील कमल, आखों के अंजन, कक्षःस्थल की इन्द्रनीलमणि एवं समस्त आभरणरूप हैं उन भगवान हरि की जय हो।)
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सात वर्ष के बालक के मुख से ऐसा भावपूर्ण श्लोक सुनकर सभी उपस्थित भक्तों को परमाश्चर्य हुआ। इसे सभी ने प्रभु की पूर्ण कृपा का फल ही समझा। तब प्रभु ने कहा- ‘तैंने सबसे पहले अपने श्लोक में व्रजांगनाओं के कानों के आभूषण का वर्णन किया है, अतः तू कवि होगा और ‘कर्णपूर’ के नाम से तेरी ख्याति होगी।’ तभी से ये ‘कवि कर्णपूर’ हुए।
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ये महाप्रभु के भावों को भलीभाँति समझते थे। सच्चे सुकवि से भला किसके मनोभाव छिपे रह सकते हैं? ये सुकवि थे। इन्होंने अपनी अधिकांश कविता श्री चैतन्य देव के ही सम्बन्ध में की है।
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इनके बनाये हुए आनन्द-वृन्दावन(चम्पू), अलंकारकौस्तुभ(अलंकार), श्री चैतन्य-चरित(काव्य), श्री चैतन्य चन्द्रोदय(नाटक) और ‘गौरगनोद्देशदीपिका’ प्रभृति ग्रन्थ मिलते हैं। इनका चैतन्य चरित महाकाव्य बड़ा ही सुन्दर है। चैतन्य चन्द्रोदय नाटक की भी खूब ख्याति है। ‘गौरगनोद्देश दीपिका’ में इन्होंने श्रीकृष्ण की लीला और श्री चैतन्य की लीलाओं को समान मानते हुए यह बताया है कि गौर-भक्तों में से कौन-कौन भक्त श्रीकृष्ण लीला की किस-किस सखी के अवतार थे। इनमें रूप, सनातन, रघुदास आदि सभी गौर भक्तों को भिन्न-भिन्न सखियों का अवतार बताया गया है।
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बड़ी विशाल कल्पना है, कवि प्रतिभा ही जो ठहरी, जिस ओर लग गयी उसी ओर कमाल करके दिखा दिया। अपने पिता के सम्बन्ध में ये लिखते हैं-
पुरा वृन्दावने वीरा दूतो सर्वाश्च गोपिकाः।
निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जन को मम॥
अर्थात ‘पहले श्रीकृष्णलीला में वीरा नाम की दूती जो सभी गोपिकाओं को श्रीकृष्ण के पास ले जाया करती थी। उसी वीरा दूती के अवतार मेरे पिता (श्री शिवानन्द सेन) हैं।'
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इसी प्रकार सभी के सम्बन्ध की इन्होंने बड़ी सुन्दर कल्पनाएँ की हैं। धन्य हैं ऐसे कवि को और धन्य है उनके कमनीय काव्यामृत को, जिसका मान करके आज भी गौर-भक्त उसी चैतन्यरूपी आनन्द सागर में किलोलें करते हुए परमानन्दसुख का अनुभव करते हैं। अक्षरों को जोड़ने वाले कवि तो बहुत हैं, किन्तु सत्कवि वही है, जिसकी सभी लोग प्रशंसा करें। सभी जिसके काव्यामृत को पान करके लटटू हो जायँ।
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एक कवि ने कवि के सम्बन्ध में एक बड़ी ही सुन्दर बात कही है-
सत्यं सन्ति गृहे गृहेऽपि कवयो येषा वचश्चातुरी
स्वे हर्म्ये कुलकन्यकेव लभते स्वल्पैर्गुणैगौंरवम्।
दुष्प्रापः स तु कोपऽति कोविन्मतिर्यद्वाग्रसग्राहिणां
पण्यस्त्रीव कलाकलापकुशला चेतांसि हर्तु क्षमा॥
‘वैसे तो बोलने चालने और बातें बनाने में जो औरों की अपेक्षा कुछ व्युत्पन्नमति के होते हैं ऐसे कवि कहलाने वाले महानुभाव घर घर मौजूद हैं। अपने परिवार में जो लड़की थोड़ी सुन्दरी और गुणवती होती है, उसी की कुल वाले बहुत प्रशंसा करने लगते हैं। क्योंकि उसके लिये उतना बड़ा परिवार ही संसार है। ऐसे अपने ही घर में कवि कहलाने वाले सज्जनों की गणना सुकवियों में थोड़े ही हो सकती है।
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सच्चा सुकवि तो वही है जिसकी कमनीय कविता अज्ञात कुल गोत्र वाले कलाकोविदों के मन को भी हठात अपनी ओर आकर्षित कर ले। उनकी वाणी सुनते ही उनके मुखों से वाह वाह निकल पड़े। जैसे कला कलाप में कुशल वारांगना के कुल गोत्र को न जानने वाले पुरुष भी उसके गायन और कला से मुग्ध होकर ही स्वयं उसकी ओर खिंच से जाते हैं।’ ऐसे सुकवियों के चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।
(क्रमशः)

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