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*दादू लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत ।*
*आपा पर एकै भया, छूटी सबै भरंत ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*संत हरी गुरु सौं जन१ सौं मुख२,*
*टेक३ गही वह भक्त सही है ।*
*रूप भगत्ति सुनो चित लाय सु,*
*नाम लिये दृग धार बही है ॥*
*भक्तन प्रीति विचारत वे हरि,*
*झूठ उठावन कृष्ण कही है ।*
*ले गुरु की गुरुताइ४ दिखावत,*
*श्री पय हारि निहार मही है ॥९॥*
जिसने संतों का उपदेश धारण करने का, सप्रेम हरि की उपासना करने का, गुरु की आज्ञा पालन करने का और भक्त१ जनों की सेवा करने का आग्रह३ मुख्य२ रूप से ग्रहण किया है वही सच्चा भक्त है । अब भक्ति का स्वरूप मैं कहता हूं श्रोतागण सम्यक् मन लगाकर श्रवण करें । वास्तविक भक्ति जिसमें होती है, उसके भगवत् नाम उच्चारण करते ही नेत्रों से अश्रु धरा बहने लगती है । ऐसे प्रेम को ही भक्त जन भक्ति कहते हैं ।
वे हरि अन्य सब बाह्य व्यवहार को छोड़कर भक्त के हृदय की भक्ति का विचार करते हुए ही भक्तों का कार्य करते हैं । देखो ! महाभारत इतिहास में यह बात कही है कि “पांडवों के राजसूय यज्ञ के समय श्री कृष्ण भगवान् ने झूठी पत्तलें उठाई थीं ।” हरि के उक्त व्यवहार को ग्रहण करके ही गुरुजन भी गुरु की महत्ता४ को दिखाते रहे हैं । देखो श्री कृष्णदास पयहारी ने आंमेर के महीपति पृथ्वीराज को आंमेर में रहते हुये ही द्वारिका में स्थित गोमती नदी का स्नान कराया था और भुजा पर वहां की छाप लगायी थी । अतः संत, हरि, गुरु और भक्तों का चमत्कारपूर्ण चरित्र तथा भक्ति का निरूपण ही भक्तमाल का स्वरूप है । सो इस भक्तमाल में पूर्ण रूप से है ही ।
(क्रमशः)

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