🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*५. परचा कौ अंग ~ ३१३/१६*
.
धरती मांहै हम नहीं, नहीं गगन मंहि बास ।
तेज पुंज हरि मांहि हम, सु कहि जगजीवनदास ॥३१३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम न तो धरती पर स्थित हैं ना ही गगन में हमारा वास है हम तो परमात्मा की प्रभा में स्थित हैं ।
.
जाकी सेज बिराजि हरि, मगन किया मन प्रांण ।
कहि जगजीवन तहां रस, अम्रित स्त्रवै ससि भांण६ ॥३१४॥
(६. अम्रित स्त्रवै ससि भांण-चन्द्रमा एवं सूर्य की कलाओं में अमृत झरता है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिन परमात्मा का सानिध्य पाकर मन प्राण मगन हो गये हैं वहां सूर्य चन्द्र नित्य अमृत स्त्रावित होते हैं ।
.
मनसा सकती रांम वर, रांम मैं रांम निवास ।
सरवत रूप अरूप हरि७, सु कहि जगजीवनदास ॥३१५॥
(७. सरवत रूप अरूप हरि - भगवान् सर्वत्र साकार या निराकार रूप से विराजमान हैं ।)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मनोरथ से राम पा सकते हैं राम में ही राम रुप है । संत कहते हैं साकार या निराकार प्रभु सर्वत्र विराजमान हैं ।
.
पंच८ त्रिया गोपी बनी, हंस कान्ह हरि रास ।
कोतिग देखैं देव मुनि८, सु कहि जगजीवनदास ॥३१६॥
{८-८. इस शरीर में पाँचों इन्द्रियाँ ही गोपी हैं, साधक(हंस) ही कान्ह(कृष्ण) हैं तथा हरि(इष्ट देव परमात्मा) ही रास भूमि हैं । समर्थ देवता एवं ऋषि भी इस लीला को आश्चर्य(कोतिग) की दृष्टि से देखते ही रह जाते हैं ॥३१६॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांच इन्द्रियाँ गोपी हैं । जीव कृष्ण है व इष्ट ही रास आधार है । इस कौतुक पूर्ण रास को दैव भी देखने की इच्छा रखते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें