सोमवार, 17 अगस्त 2020

योग और भोग

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷 
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷 
https://www.facebook.com/DADUVANI 
*ना घर रह्या न वन गया, ना कुछ किया कलेश ।* 
*दादू मन ही मन मिल्या, सतगुरु के उपदेश ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ मध्य का अंग)* 
================ 
*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ* 
श्रीरामकृष्ण – गीता का सार यही है कि हे जीव, सब त्यागकर भगवान् का लाभ करने के लिए साधना करो । 
नवद्वीप- त्याग की ओर तो मन नहीं जाता ! 
श्रीरामकृष्ण- तुम लोग गोस्वामी हो, तुम्हारे यहाँ देवसेवा होती है, - तुम्हारे संसार-त्याग करने पर काम नहीं चलेगा । ऐसा करने से देवसेवा कौन करेगा ? तुम लोग मन से त्याग करना । 
“ईश्वर ही ने लोगशिक्षा के लिए तुम लोगों को संसार में रखा है । तुम हजार संकल्प करो, त्याग नहीं कर सकोगे । उन्होंने तुम्हें ऐसी प्रकृति दी है कि तुम्हें संसार का कामकाज करना ही पड़ेगा । “श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- ‘युद्ध नहीं करूँगा’ यह तुम क्या कह रहे हो ? इच्छा करने ही से तुम युद्ध से निवृत्त न हो सकोगे । तुम्हारी प्रकृति तुमसे युद्ध करायेगी ।” 
श्रीकृष्ण अर्जुन से बातें कर रहे हैं- यह कहते ही श्रीरामकृष्ण फिर समाधिस्थ हो रहे हैं । बात ही बात में सब अंग स्थिर हो गये । आँखें एकटक हो गयीं । साँस चल रही है कि नहीं-जान नहीं पड़ता । नवद्वीप गोस्वामी, उनके लड़के और भक्तगण निर्वाक् हो यह दृश्य देख रहे हैं । 
कुछ प्रकृतिस्थ हो श्रीरामकृष्ण नवद्वीप से कहते हैं- 
“योग और भोग । तुम लोग गोस्वामी वंश के हो, तुम लोगों के लिए दोनों है । 
“अब केवल प्रार्थना, हार्दिक प्रार्थना करो कि हे ईश्वर, तुम्हारी इस भुवनमोहिनी माया के ऐश्वर्य को मैं नहीं चाहता - मैं तुम्हें चाहता हूँ । 
“ईश्वर तो सब प्राणियों में हैं । फिर भक्त किसे कहते हैं ? जो ईश्वर में रहता है, जिसका मन, प्राण, अन्तरात्मा – सब कुछ उसमें लीन हो गया है ।” 
अब श्रीरामकृष्ण सहज दशा में आ गये हैं । नवद्वीप से कहते हैं- “मुझे यह जो अवस्था(समाधि-अवस्था) होती है, इसे कोई कोई रोग कहते हैं । इस पर मेरा कहना यह है कि जिसके चैतन्य से जगत् चैतन्यमय है उसकी चिन्ता कर कोई अचैतन्य कैसे हो सकता है ?” 
मणि सेन अभ्यागत ब्राह्मणों और वैष्णवों को बिदा कर रहे हैं – उनकी मर्यादा के अनुसार किसी को एक रुपया, किसी को दो रुपये बिदाई देते हैं । श्रीरामकृष्ण को पाँच रुपये देने आये । आप बोले, “मुझे रुपये दोगे तो तुम्हें तुम्हारे गुरु की शपथ है ।’ मणि सेन इतने पर भी देने आये । तब श्रीरामकृष्ण ने अधीर होकर मास्टर से कहा, “क्यों जी, लेना चाहिए ?” मास्टर ने बड़ी आपत्ति करते हुए कहा, “जी नहीं ! किसी हालत में न लें !” 
मणि सेन के घरवालों ने तब आम और मिठाई खरीदने के नाम पर राखाल के हाथ में रुपये दिए । 
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- मैंने गुरु की शपथ दी है – मैं अब मुक्त हूँ । राखाल ने रुपये लिए हैं – अब वह जाने ! 
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ गाड़ी पर बैठे – दक्षिणेश्वर लौट जाएँगे ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें