शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

= ३५३ =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग विलावल २१(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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३५३ - (पँजाबी) **क्रीड़ा तालश्वंडनि**
आसण रमदा१ रामदा२, हरि इथाँ३ अविगत आप वे ।
काया काशी वँजणाँ४, हरि इथैं पूजा जाप वे ॥टेक॥
महादेव मुनि देवते, सिद्धैंदा विश्राम वे ।
स्वर्ग सुखासण हुणें५, हरि इथैं आत्मराम वे ॥१॥
अमीं सरोवर आतमा, इथाँई आधार वे ।
अमर थान अविगत रहे, हरि इथैं सिरजनहार वे ॥२॥
सब कुछ इथैं आव वे, इथाँ परमानन्द वे ।
दादू आपा दूर कर, हरि इथांई आनन्द वे ॥३॥
इति राग विलावल समाप्त: ॥२१॥पद २०॥
सब में रमने१ वाले राम२ का सिंहासन(अष्टदल कमल) शरीर३ में ही है और वे मन इन्द्रियों के अविषय स्वयँ हरि भी आत्म रूप से शरीर में हैं । काया में ही(सहस्रार चक्र रूप) काशी में जाना४ होता है और शरीर के हृदय देश में ही हरि की मानस - पूजा तथा जाप होता है ।
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महादेव, मुनिगण, देवता और सिद्धों के विश्राम स्थान - सहस्रार चक्र, विचार, इन्द्रिय और ध्यान भी शरीर में ही हैँ । पाप - ताप हरने वाले आत्म स्वरूप राम के दर्शन जन्य जो आनन्द५ प्राप्त होता है वही शरीर में स्वर्ग का सुखासन है ।
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सबका आधार अमृत - सरोवर आत्मा भी शरीर में ही पाया जाता है । जिसमें मन इन्द्रियों के अविषय, सृष्टि कर्ता हरि रहते हैं और प्राप्त होते हैं, वह समाधि स्थान भी शरीर में ही है । सब कुछ शरीर में ही है, शरीर में ही परमानन्द प्राप्त होता है । तुम सब प्रकार के अहँकार को दूर करके अन्तर्मुख वृत्ति द्वारा भीतर आओ तो आनन्द स्वरूप हरि प्राप्त होंगे । इस पद से नागरजी को उपदेश दिया था । नागर निजामजी की प्रसंग कथा दृष्टांत - सुधा - सिन्धु तरँग ३ - २४ में देखो। ३५२ - ३५३ पदों का विषय विस्तार से काया बेली ग्रँथ है ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका राग विलावल समाप्त: ॥ २१ ॥
(क्रमशः)

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