शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(२१/२४)* =

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*ज्यों राखै त्यों रहेंगे, अपने बल नांही ।*
*सबै तुम्हारे हाथ है, भाज कत जांही ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२* 

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भावी१ भाल२ न ऊतरे, भूत३ न भावी भाग ।
रज्जब रचना क्यों टलै, भावै४ सो५ भावै जाग ॥२१॥
होनहार१ मस्तक२ से नहीं उतरता अर्थात होकर ही रहता है प्राणी३ से होनहार नहीं भागता । चाहे४ शयन५ कर, चाहे जाग, होनहार रूप ईश्वर की रचना नहीं टलती ।
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भगवंत भाग्य मोटा१ दिया, छोटा किस कन२ होय ।
प्रभु पसाव३ सो क्यों घटै, काहे कलपै४ कोय ॥२२॥
यदि भगवान ने भाग्य महान्१ बना दिया है तो वह छोटा किससे२ हो सकता है ? प्रभु का जो अनुग्रह३ है सो कम कैसे हो सकता है ? अत: उसके कम करने के लिये कोई क्यों दुखी४ हो ।
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पैठहि१ शैल२ समुद्र मधि, रिधि३ मुक्ता४ के भाय५ ।
भाग्य बिना खान्यों दबै, वाहि मगर मच्छ खाय ॥२३॥
धन३ के लिये५ पर्वत२ की खानियों में प्रवेश१ करता है तब धन३ मिलने का भाग्य न हो तो खानियों में ही दब जाता है और मोती४ के लिये समुद्र में प्रवेश करे तो भाग्य बिना मोती न मिल कर मगरमच्छ खा जाता है ।
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वारि१ लोक२ बड़वानल लहिये, यह उग्रह३ सु अभाग४ ।
परबत पर पाणी मिलै, रज्जब अज्जब५ भाग६ ॥२४॥
जल१ के स्थान२ समुद्र में प्रवेश करने पर भी बड़वानल नामक अग्नि मिल जाय, यह अभाग्य४ ही खुलता३ है और शुष्क पर्वत पर भी जल मिल जाय यह अदभुत५ भाग्य६ ही है ।
(क्रमशः)

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