सोमवार, 17 अगस्त 2020

*(“तृतीयोल्लास” ४/६)*

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“तृतीयोल्लास” ४/६)*
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प्रगट भये सिद्घ पुनि दोऊ, गोरखनाथ कह्यो सब भेऊ । 
मिले विवेकी राम सनेही, भये प्रसन्न हरि की देही ॥४॥ 
वे दोनों बालक फिर सिद्घ रूप में प्रगट हुये और गोरखनाथजी ने उन्हें अलख का सब रहस्य बताया, ज्ञानवान राम से स्नेह रखने वाले तीनों परस्पर मिले और परम प्रसन्न होकर हरि स्वरूप हो गये ॥४॥ 
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सबद विचारै हरि रंग भीनां, मिले बनांणी लाहौ लीना । 
ज्यूं जल में जल एकै होई, मिसरी जैसै जल में सोई ॥५॥ 
उन तीनों ने हरि रंग प्रेम में भीगे हुये शब्दों पर विचार किया अर्थात् ब्रह्म चर्चा में तल्लीन हो गये और सतगुरु के साथ मिलकर ब्रह्म रस का लाभ प्राप्त किया । जिस प्रकार जल में जल मिलकर एक हो जाता है और मिश्री जल में मिलकर उसमें घुल जाती है एक हो जाती है उसी प्रकार के ब्रह्म स्वरूप में मिले ॥५॥ 
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*ज्ञानमाणक दास समुद्र के किनारे पहुंचे*
हरषवांन मगन गुन गांवें उरि स्थान गुरु को ध्यावे । 
धीरे धीरे चलै सु बाट, पहुंचे जाय समद के घाट ॥६॥ 
वे दोनों प्रसन्न होकर हरि स्मरण में मगन होकर हरि के गुणगान करते हुये और अपने हृदय में गुरु का ध्यान करते हुये वे धीरे धीरे अपनी राह पर चलते रहे और समुद्र के घाट तीर पर पहुंचे ॥६॥ 
(क्रमशः)

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