सोमवार, 17 अगस्त 2020

*५. परचा कौ अंग ~ २८९/२९२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*५. परचा कौ अंग ~ २८९/२९२*
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तेज पुंज प्रकास करि, बरषावै वर नूर ।
जगजीवन तहँ देखिये, रांम सकल भरपूर ॥२८९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि तेज पुंज का प्रकाश करके प्रभु तेज पुंज की बरसात करते हैं संत कहते है कि वहां ही परमात्मा का सकल स्वरुप दिखता है ।
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अजपा४ अनहद५ उनमनी६, ब्रह्म अगनि हरि नांम ।
कहि जगजीवन सब लहै, क्रिपा करै जे रांम ॥२९०॥
(४. अजपा जाप-जिह्वा की सहायता के बिना मानसिक नाम चिन्तन) (५. अनहद नाद- अनाहत नाद) (६. उनमनी-एकाग्रचित्त समाधि) 
संतजगजीवन जी कहते है की जो बिना जिह्वा के गेय हो ऐसा मानसिक चितंन जो अनाहत नाद हो ओर उस ब्रह्म पूजा की अग्नि हरि नाम हो । चित में एकाग्रता हो ऐसा सब प्रभु कृपा से होता है ।
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ध्रिग दहँदिस देखत थके, अनंत चरित दिलदार ।
कहि जगजीवन निवाजै, हरि जन राखै लार ॥२९१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नेत्र दसों दिशाओं में देखते थक गये कि परमात्मा जैसा कोइ और भी मिले । पर जैसी कृपा प्रभु करते हैं वे अपने जन को सदा अपने पीछे रखते हैं उसे दूर नहीं करते, ऐसी कोइ भी नहीं करता ।
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जे७ कबहूँ बिगसै कंवल, नख सिख लेइ प्रकास ।
इस सुख सौ सुख और नहिं, सु कहि जगजीवनदास७ ॥२९२॥
{७-७, तुलनीय श्रीदादूवाणी-(२।७३) 
सब सुख सुर प्याल के, तोलि तराजू बाहि । 
हरि सुष एक पलक का, ता सम कह्या न जाइ ॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जब कभी अतंर में आत्म कमल प्रकटता है तो उससे सम्पूर्ण प्रकाश होता है और उस प्रकाश से जब अज्ञान अंधकार मिटता है तो वैसा फिर अन्य कोइ विषय आनंद दायक नहीं होता है ।
(क्रमशः)

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