सोमवार, 31 अगस्त 2020

= ३६० =

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*#श्रीदादू०अनुभव०वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग सूहा २२(गायन समय दिन ९ से १२)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**काया बेली ग्रन्थ**
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३६० - वर्ण भिन्न ताल
काया मांहीं सब कुछ जान, 
काया मांहीं लेहु पिछान ।
काया मांहीं बहु विस्तार, 
काया मांहीं अनन्त अपार ॥१॥
काया मांहीं अगम अगाध, 
काया मांहीं निपजे साध ।
काया मांहीं कह्या न जाइ, 
काया मांहीं रहे ल्यौ लाइ ॥२॥
काया मांहीं साधन सार, 
काया मांहीं करै विचार ।
काया मांहीं अमृत वाणी, 
काया मांहीं सार - प्राणी ॥३॥
काया मांहीं खेल ह्वै प्राण, 
काया मांहीं पद निर्वाण ।
काया मांहीं मूल गह रहे, 
काया मांहीं सब कुछ लहै ॥४॥
काया मांहीं निज निरधार, 
काया मांहीं अपरम्पार ।
काया मांहीं सेवा करै, 
काया मांहीं नीझर झरै ॥५॥
काया मांहीं वास कर, 
रहे निरँतर छाइ ।
दादू पाया आदि घर, 
सतगुरु दिया दिखाइ ॥६॥
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**= काया मांहीं सब कुछ जान, काया मांहीं लेहु पिछान =**
जो ब्रह्माँड में है सो सभी कुछ काया में है, यह गुरु द्वारा जानकर साधन से काया में उनका प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त करते हुये सबके आधार परब्रह्म को पहचान कर आत्म स्वरूप को प्राप्त कर लो ।
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**= काया मांहीं बहु विस्तार =**
जैसे ब्रह्माँड में माया का बहुत विस्तार हो रहा है, वैसे ही काया में मन के मनोरथों का स्वप्न बहुत विस्तृत भासता है ।
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**= काया मांहीं अनन्त अपार =**
जिसका शुभ अनन्त है, वह अपार प्रभु भी काया में विद्यमान है ।
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**= काया मांहीं अगम अगाध =**
जिसमें मन इन्द्रियों की गति नहीं होती वह अगाध व्यापक ब्रह्म भी काया के प्रत्येक अणु में है ।
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**= काया मांहीं निपजे साध =**
सँत भी बाह्य भेष द्वारा न होकर भजनादि साधन द्वारा काया में ही बसते हैं ।
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**= काया मांहीं कह्या न जाइ =**
जो वाणी से कहा नहीं जाता वह ब्रह्म काया में ही है ।
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**= काया मांहीं रहे ल्यौ लाइ =**
सँत जन बाह्य प्रपँच से उपराम रहकर काया में ही उस ब्रह्म में वृत्ति लगाकर स्थिरता पूर्वक रहते हैं ।
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**= काया मांहीं साधन सार =**
ब्रह्म चिन्तन रूप सार - साधन भी काया में ही होता है ।
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**= काया मांहीं करै विचार =**
विचारक सँत काया में ही बुद्धि द्वारा ब्रह्म विचार करते हैं ।
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**= काया मांहीं अमृत वाणी =**
अहँकार रहित प्रिय, ब्रह्म विचार सँपन्न, अमरत्व प्रदान करने वाली, अमृत वाणी भी शरीर में है, तभी तो सँतों के मुख द्वारा बोली जाती है ।
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**= काया मांहीं सारँग प्राणी =**
काया में सारँग(परमेश्वर) और प्राणधारी जीव दोनों ही स्थित हैं ।
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**= काया मांहीं खेले प्राण =**
काया में सँत प्राणी परमेश्वर के साक्षात्कार जन्य आनँद का अनुभव रूप खेल खेलते हैं ।
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**= काया मांहीं पद निर्वाण =**
काल - कर्म के बाणाघात से रहित निर्वाण पद स्वरूप आत्मा काया में स्थित है ।
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**= काया मांहीं मूल गह रहे =**
सबका मूल ब्रह्म वो शब्द सृष्टि का मूल ओंकार उसको सँत काया में ही ग्रहण करके उसी में स्थिर रहते हैं ।
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**= काया मांहीं सब कुछ लहै =**
साधक काया में ही ब्रह्म - चिन्तन रूप चिन्तामणि से सब कुछ प्राप्त करते हैं ।
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**= काया मांहीं निज निरधार, काया मांहीं अपरँपार =**
काया में ही विचार द्वारा निज स्वरूप का निर्णय करो, वह अपरँपार स्वरूप कूटस्थ काया में ही है ।
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**= काया मांहीं सेवा करै =**
सँतजन काया में ही परब्रह्म की सेवा - पूजा करते हैं ।
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**= काया मांहीं नीझर झरै =**
काया में निरँतर तालु मूल से अमृत झरता रहता है वो उक्त प्रकार सेवा - पूजा करने वालों को प्रभु - प्रेमामृत वो आनन्दामृत निरँतर प्राप्त रहता है ।
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**= काया मांहीं बास कर, रहे निरँतर छाइ =**
काया में स्थित प्रभु के स्वरूप में वृत्ति द्वारा निवास करते हुये, और निरँतर ब्रह्माकार वृत्ति रखते हुये स्थिर रहना चाहिए ।
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**= दादू पाया आदि घर, सतगुरु दिया दिखाइ =**
यह मार्ग हमको सद्गुरु ने दिखाया है और हमने निरँतर ब्रह्माकार वृत्ति रखते हुये ब्रह्म रूप अपना आदि स्थान प्राप्त किया है ।
(क्रमशः)

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