सोमवार, 31 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(४९/५२)* =

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*भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया ।*
*दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२*
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भाग्य राज घर औतरे१, भाग्य गुरु गृह दास ।
धर्या२ अधर३ अभाग्य हि मिलै, भाग्य भरै४ उर आस ॥४९॥
भाग्य से ही राज घर में जन्म१ होता है, भाग्यवश ही सेवक गुरु के घर में पहुंचाता है, माया३ और ब्रह्म४ दोनों भाग्य से ही मिलते हैं, भाग्य से ही हृदय की आशा पूर्ण४ होती है ।
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बखतों ही बीती पड़ै१, पर धन अपना होय ।
रज्जब भागी भोल२ सब, भाग हुं सिवा३ न कोय ॥५०॥
भाग्यवश किसी समय ऐसी स्थिति भी आ पड़ती१ है कि पर धन भी अपना हो जाता है, अब हमारा तो सभी भोलापन२ भाग जाता है और निश्चय हो गया है - भाग्य बिना३ सुखादि का कारण और कोई भी नहीं है ।
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इक कौड़ी कौड़ी को फिर ही, इक बैठे कोड़ि१ न लेही ।
रज्जब भूत हुं भाग्य भिन्न, कहो पटतर२ क्यों देही ॥५१॥
एक तो कौड़ी को मांगता फिरता है और एक अपने आसन पर स्थित रहकर भी कोटि१ रुपये भी नहीं लेता । अत: प्राणियों का भाग भिन्न भिन्न ही होता है, कहो, एक को दूसरे से सम२ होने का परिचय कैसे दिया जा सकता है ?
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लोह कनक पारस परसि, छत्रपति छाँह हमाय१ ।
हनुमंत हांक गुरु गिरा सुनि, रज्जब बखत२ कमाय ॥५२॥
पारस से स्पर्श होते ही लोहा सुवर्ण हो जाता है, हुमा१ पक्षी की छाया पड़ने पर नर राजा हो जाता है, सिंहल दीप में हनुमानजी की हांक सुनकर नर नपुसंक हो जाता है, वैसे ही गुरु की वाणी सुनकर जीव ब्रह्म हो जाता है । यह सब समय२ से ही कमाये जाते हैं अर्थात कर्म फल प्राप्त होने का समय आता है ।
(क्रमशः)

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