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*जे कुछ कहिये सोच विचारा,*
*ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥*
*साइर बूँद कैसे कर तोलै,*
*आप अबोल कहा कहि बोलै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २४३)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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नीसाणी छप्पय-
*दिनकर को जो दीवो, जिती ले ज्योति दिखावे ।*
*शशि को सीरक१ सींक, भरे सन्मुख शिर नावे ॥*
*वाणी गणपति को जु, गुणी द्वै अक्षर चढावे ।*
*भजन भक्ति जग जोग, कृतहिं शिव शेष मनावे ॥*
*श्रोत्र वृत्ति सनकादिकी, मुनी नारद ज्यूं गावे ।*
*राघव रीति बड़ेन की, का पै बनि आवे ॥१९॥*
जैसे सूर्य को दीपक जो कर जितनी ज्योति दिखाई जाती है वह सूर्य के आगे तुच्छ ही सिद्ध होती है । शीतल-करने-वाले-द्रव-रस१ की सींक भर के और चन्द्रमा के सन्मुख होकर शिर नवाते हैं तब वह सींक भी चन्द्रमा की शीतलता से अत्यन्त कम ही होती है ।
सरस्वती तथा गणपति को गुणीजन अक्षरों के द्वारा रचित दो पद्य चढाते हैं, वे भी उनके आगे कोई विशेषता नहीं रखते । अपने किये हुये भजन, भक्ति, यज्ञ, योगादि शुभ कर्मों से शिव और शेष जी को मनाते हैं किन्तु शिव और शेष जी के किये हुये साधनों के आगे कुछ भी महत्त्व नहीं रखते ।
श्रोत्र वृत्ति सनकादिक के समान रखने की बात कहते हैं किन्तु रख नहीं सकते, नारद मुनि के समान गाने की बात कहते हैं परन्तु गा नहीं सकते । वैसे ही बड़े पुरुषों की रीति का निर्वाह किससे बन पाता है? अर्थात नहीं । वैसे ही मुझ से भी बड़ों की समता तो नहीं हो सकती किन्तु जैसे उक्त सभी समता नहीं होने पर भी अपनी भावना के अनुसार ज्योति आदि दिखाते ही हैं वैसे ही मैं भी भक्तमाल की रचना करता हूं ।
(क्रमशः)

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