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*विसरे अंजन मंजन चीरा,*
*विरह व्यथा यहु व्यापै पीरा ॥*
*नव-सत थाके सकल श्रृंगारा,*
*है कोई पीड़ मिटावनहारा ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. १०)*
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*साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ*
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(२)
*श्रीगौरांग का महाभाव, प्रेम और तीन अवस्थाएँ ।*
दोपहर का समय है । राखाल, राम आदि भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण मणि सेन की बैठक में विराजमान हैं । नवद्वीप गोस्वामी भोजन करके श्रीरामकृष्ण के पास आ बैठे हैं ।
मणि सेन ने श्रीरामकृष्ण को गाड़ी का किराया देना चाहा । श्रीरामकृष्ण बैठक में एक कोच पर बैठे हैं, “और कहते हैं गाड़ी का किराया वे लोग(राम आदि) क्यों लेंगे? वे तो पैसा कमाते हैं ।”
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अब श्रीरामकृष्ण नवद्वीप गोस्वामी से ईश्वरी प्रसंग करने लगे ।
श्रीरामकृष्ण(नवद्वीप से)- भक्ति के परिपक्व होने पर भाव होता है, फिर महाभाव, फिर प्रेम, फिर वस्तु(ईश्वर) का लाभ होता है ।
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“गौरांग को महाभाव और प्रेम हुआ था ।”
“इस प्रेम के होने पर मनुष्य जगत् को तो भूल ही जाता है बल्कि अपना शरीर, जो इतना प्रिय है, उसकी भी सुधि नहीं रहती । गौरांग को यह प्रेम हुआ था । समुद्र को देखते ही यमुना समझकर वे उसमें कूद पड़े !
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“जीवों को महाभाव या प्रेम नहीं होता, उनको भाव तक ही होता है । फिर गौरांग को तीन अवस्थाएँ होती थीं ।”
नवद्वीप-जी हाँ । अन्तर्दशा, अर्धबाह्य दशा और बाह्य दशा ।
श्रीरामकृष्ण- अन्तर्दशा में वे समाधिस्थ रहते थे, अर्धबाह्य दशा में केवल नृत्य कर सकते थे, और बाह्य दशा में नामसंकीर्तन करते थे ।
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नवद्वीप ने अपने लड़के को लाकर श्रीरामकृष्ण से परिचित करा दिया । वे तरुण हैं - शास्त्र का अध्ययन करते हैं । उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया ।
नवद्वीप- यह घर में शास्त्र पढ़ता है । इस देश में वेद एक प्रकार से अप्राप्य ही थे । मैक्समूलर न उन्हें छपवाया, इसी से तो लोग अब उनको पढ़ सकते हैं ।
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*पाण्डित्य और शास्त्र*
श्रीरामकृष्ण-अधिक शास्त्र पढ़ने से और भी हानि होती है ।
“शास्त्र का सार जान लेना चाहिए । फिर ग्रन्थ की क्या आवश्यकता है ?
“शास्त्र का सार जान लेने पर डूबकी लगानी चाहिए – ईश्वर का लाभ करने के लिए ।
“मुझे माँ ने बतला दिया है कि वेदान्त का सार है- ‘ब्रह्म सत्य और जगत् मिथ्या ।’ गीता का सार क्या है? दस बार ‘गीता’ शब्द कहने से जो हो वही – अर्थात् त्यागी, त्यागी ।
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नवद्वीप- ठीक ‘त्यागी’ नहीं बनता, ‘तागी’ होता है । फिर उसका भी अर्थ वही है । ‘तग्’ धातु और ‘घञ्’ प्रत्यय=ताग उस पर ‘इन्’ प्रत्यय लगाने पर ‘तागी’ बनता है । ‘त्यागी’ का अर्थ जो है, ‘तागी’ का भी वही है ।
(क्रमशः)

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