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*दादू भक्ति निरंजन राम की, अविचल अविनाशी ।*
*सदा सजीवन आतमा, सहजैं परकाशी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*भक्ति-स्वरूप वर्णन*
*भावत१ भक्ति तिया सब संतन,*
*तासु स्वरूप सुनो नर लोई२ ।*
*नाम सु नीर नवन्य३ नहावन,*
*वेश४ विवेक बन्यो बपु वोई५ ॥*
*भूषण भाव चुरा६ चित चेतन,*
*सौंध७ संतोष सु अंग समोई८ ।*
*अंजन आनँद पान सचोपन,*
*सेज सदा सत संगति सोई ॥३॥*
भगवान् की भक्ति रूप नारी माता रूप में सभी संतों को प्यारी१ लगती है । हे नर लोगों२ ! उस भक्ति का स्वरूप मैं सुनाता हूँ तुम मन लगाकर सुनो । भगवान् का नाम ही उसके स्नान के लिये सुन्दर जल है । नम्रता३ ही स्नान क्रिया है । सत्यासत्य का निर्णय रूप विवेक ही उसके५ शरीर पर वस्त्र४ है । श्रद्धा-भावरूप ही भूषण धारण करती है ।
चित्त में चेतन ब्रह्म का चिन्तन ब्रह्म का चिन्तन करता रूप चूड़ा६ पहना है । शरीर में संतोष रूप सुगंधी७ लगाई८ हुई है । ब्रह्मानन्द रूप अंजन नेत्रों में लगा है । सत्यता रूप पान मुख में हैं और सदा सतसंगति रूप शय्या पर शयन करती है । उक्त भगवान् के नाम और दैवी-गुण आदि ही वास्तव भक्ति का स्वरूप है । बाह्य चिन्ह भक्ति का वास्तव स्वरूप नहीं हो सकता, यह सत्य ही है ।
(क्रमशः)

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