मंगलवार, 25 अगस्त 2020

= *वक्त ब्यौरा का अंग १२२(२९/३२)* =

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*उपजै विनशै गुण धरै, यहु माया का रूप ।*
*दादू देखत थिर नहीं, क्षण छांहीं क्षण धूप ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वक्त ब्यौरा का अंग १२२* 
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गोला छूटा और दिशि, पंखी आया बीच ।
रज्जब कहिये कौन सौं, भागों१ ह्वै गई मीच ॥२९॥
गोला तो दूसरी दिशा में छोड़ा था किन्तु पक्षी उड़कर उसे मार्ग के बीच में आ गया, अब कहिये ? किसको क्या कहैं, उसके दुर्भाग्य१ से ही मृत्यु हो गई ।
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अनल पंख आदित्य जरी, बड़वानल सौं मीन ।
जीवनि ठौर सु जम१ भई, काहि कहै मिसकीन२ ॥३०॥
अनल पक्षी सूर्य की किरणों और मच्छी बड़वानल से जल जाते हैं, आकाश और जल दोनों को ही जीवन रूप स्थान मृत्यु१ बन जाय तब वे गरीब२ किसको दोषी कहैं ?
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नर तरु तारें सम नहीं, जो सिरजे करतार ।
रज्जब घटि बध बीच के, बाबै१ हाथ विचार ॥३१॥
जो ईश्वर के रचित-मनुष्य, वृक्ष और तारे हैं सो सम नहीं हैं, कम, अधिक और मध्य के उत्पन्न करने का विचार परमेश्वर१ के ही हाथ में है ।
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चतुर१ खानि के जीव जग, नांही एक समान ।
त्यों रज्जब सुन हेत२ रज३, ये भी यूं ही जान ॥३२॥
जगत् में जरायुज, अंडज, उदभिज और स्वेदज इन चार१ खानियों के जीव एक समान नहीं होते हैं वैसे ही स्नेह२, पाप३ ये भी इस प्रकार ही जान अर्थात समान नहीं हैं ।
(क्रमशः)

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