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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*राघवदासजी का वर्णन*
*संत स्वरूप यथारथ गाइउ,*
*कीन्ह कवित्त मनूं यह हीरा ।*
*साधु अपार कहे गुण ग्रंथन,*
*थोर हु आंकन में सुख सीरा१ ॥*
*संत सभा सुन हैं मन लय सु,*
*हंस पिवे पय छोड़ रु नीरा ।*
*राघवदास रसाल२ विशाल सु,*
*संत सबै चल आवत कीरा३ ॥७॥*
राघवदास जी ने जिस संत का जिस रस की प्रधानता को लिये हुये भावना मय जैसा स्वरूप था वैसा ही यथार्थ रूप से ही कथन किया है और कवित्त ऐसे रचे हैं कि मानो हीरा ही चमक रहा है अर्थात् जैसे अति झीने वस्त्र में से हीरा चमकता है वैसे ही कवित्तों का उत्तम अर्थ शब्दों में से चमक रहा है । पंच रसों का आश्रय लेकर भक्ति करने वाले संतों के अपार गुण ग्रन्थों में कथन किये हैं किन्तु आपने बहुत थोड़े अक्षरों में ही कहे हैं तो भी अर्थ उनमें विस्तार रूप से भरा है जो परम सुख का उद्गम१ रूप सा भास रहा है ।
संतों की सभा इस भक्तमाल को विवेकपूर्वक मन लगाकर ऐसे सुनती है जैसे हंस जल को छोड़कर दूध का ही पान करते हैं, अर्थात् संत सार ग्राहक ही होते हैं । राघवदासजी सुविशाल आम्र२ वृक्ष के समान हैं और सब श्रोता शुक३ पक्षी के समान आकर इस आम के कवित्त रूप आम फलों के भक्ति रूप रस का आस्वादन करते हैं ।
(क्रमशः)

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